किसी बच्चे के हाथ में पहली बार पेंसिल आना और कागज पर अक्षर लिखने की कोशिश करना भले ही छोटी-सी घटना लगे, लेकिन यहीं से उसके जीवन में ज्ञान की एक नई यात्रा शुरू होती है। अक्षरों की पहचान शब्दों की समझ में बदलती है और शब्द विचारों को जन्म देते हैं। यही विचार व्यक्ति को अपने जीवन के बारे में बेहतर निर्णय लेने और आत्मनिर्भर बनने की क्षमता प्रदान करते हैं। इसलिए साक्षरता को केवल पढ़ने-लिखने तक सीमित नहीं किया जा सकता है। आज साक्षरता का अर्थ किसी सूचना को समझने, सही-गलत में अंतर करने, अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को जानने तथा रोजमर्रा की जरूरतों में ज्ञान का प्रभावी उपयोग करने की क्षमता भी है। बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन सेवाएं, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और सोशल मीडिया के दौर में डिजिटल एवं सूचना साक्षरता का महत्व तेजी से बढ़ा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने इसमें एक नया आयाम जोड़ दिया है, जहां तकनीक के साथ उसकी विश्वसनीयता और सीमाओं को समझना भी जरूरी हो गया है।
हर वर्ष 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। यह दिन शिक्षा को मानव विकास और सामाजिक परिवर्तन का आधार मानने की प्रेरणा देता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2024 में दुनिया में करीब 754 मिलियन वयस्क निरक्षर थे, जिनमें 63 प्रतिशत महिलाएं थीं। इसी अवधि में वैश्विक वयस्क साक्षरता दर 88 प्रतिशत और युवा साक्षरता दर 93 प्रतिशत रही। ये आंकड़े बताते हैं कि प्रगति हुई है, लेकिन सार्वभौमिक साक्षरता का लक्ष्य अभी दूर है। साक्षरता की वास्तविक सफलता तभी है, जब ज्ञान हर व्यक्ति को समझ, अवसर, आत्मविश्वास और सम्मान के साथ जीवन जीने की शक्ति दे।
साक्षरता : अक्षर पहचानने से कहीं आगे
साक्षरता का सामान्य अर्थ पढ़ने और लिखने की क्षमता से लगाया जाता है, लेकिन बदलती दुनिया में इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक हो गया है। केवल शब्दों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है; जरूरी यह है कि व्यक्ति उनके अर्थ को समझे, मिली हुई जानकारी का सही इस्तेमाल करे और उसके आधार पर उचित निर्णय ले सके। इसी सोच ने कार्यात्मक साक्षरता को आधुनिक शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। कार्यात्मक साक्षरता का अर्थ है कि व्यक्ति पढ़ने, लिखने और गणना के ज्ञान का उपयोग अपने रोजमर्रा के जीवन में प्रभावी ढंग से कर सके। किसान बीज और खाद के पैकेट पर दी गई जानकारी समझ सके, मौसम का पूर्वानुमान पढ़ सके और सरकारी योजनाओं की शर्तों को जान सके। श्रमिक अपने वेतन, बैंक खाते और सरकारी सुविधाओं से संबंधित दस्तावेज समझने में सक्षम हो। इसी तरह महिलाएं स्वास्थ्य संबंधी सलाह, दवाओं के निर्देश और बच्चों की शिक्षा से जुड़े जरूरी कागजात आसानी से समझ सकें। वास्तव में साक्षरता की सार्थकता इसी में है कि वह व्यक्ति को केवल ज्ञान प्राप्त करने तक सीमित न रखे, बल्कि उसे सोचने, समझने, निर्णय लेने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपने जीवन को बेहतर बनाने की क्षमता प्रदान करे।
दुनिया में साक्षरता की स्थिति
वैश्विक स्तर पर साक्षरता में पिछले दशकों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन इसकी रफ्तार सभी क्षेत्रों में समान नहीं रही। संयुक्त राष्ट्र के 2025 के सतत विकास लक्ष्य (SDG) आंकड़ों के अनुसार 2024 में दुनिया की वयस्क साक्षरता दर 88 प्रतिशत और युवा साक्षरता दर 93 प्रतिशत रही। वर्ष 2014 से 2024 के बीच वयस्क साक्षरता में तीन प्रतिशत अंक और युवा साक्षरता में दो प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई। हालांकि, वैश्विक औसत के पीछे क्षेत्रीय असमानताएं स्पष्ट हैं। 2024 में उप-सहारा अफ्रीका में वयस्क साक्षरता दर करीब 69 प्रतिशत रही, जबकि मध्य और दक्षिण एशिया में यह 77 प्रतिशत थी। इसके विपरीत यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यह दर 98 प्रतिशत से अधिक रही। ये आंकड़े बताते हैं कि कुछ क्षेत्र सार्वभौमिक साक्षरता के करीब पहुंच चुके हैं, जबकि कई हिस्सों में करोड़ों लोग अब भी बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं। इसलिए वैश्विक साक्षरता अभियान को समान अवसर और समावेशी शिक्षा पर अधिक जोर देना होगा।
754 मिलियन निरक्षर वयस्कों की चुनौती
दुनिया के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक यह है कि करोड़ों वयस्क आज भी पढ़ने-लिखने की बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2024 में 754 मिलियन वयस्क निरक्षर थे, जिनमें 63 प्रतिशत महिलाएं थीं। यह स्थिति केवल शिक्षा की कमी नहीं, बल्कि गरीबी, सामाजिक असमानता, लैंगिक भेदभाव, संघर्ष, विस्थापन और कमजोर शिक्षा व्यवस्था जैसी समस्याओं से जुड़ी है। माता-पिता के निरक्षर होने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है, जबकि लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने का असर एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवारों की सामाजिक और आर्थिक प्रगति बाधित होती है। यही कारण है कि महिला साक्षरता को वैश्विक विकास, समानता और सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। साक्षरता बढ़ाना केवल अक्षर ज्ञान देना नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य के अवसर तैयार करना है।
भारत की साक्षरता यात्रा
भारत की साक्षरता यात्रा लंबी और चुनौतीपूर्ण रही है। स्वतंत्रता के समय शिक्षा की पहुंच सीमित थी और गरीबी, सामाजिक असमानता, ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों की कमी तथा महिलाओं की कम शैक्षिक भागीदारी बड़ी बाधाएं थीं। दशकों के प्रयासों से स्थिति में उल्लेखनीय बदलाव आया है। स्कूलों का विस्तार हुआ, शिक्षा के अधिकार को कानूनी आधार मिला, लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा दिया गया और वयस्क साक्षरता के लिए विभिन्न अभियान चलाए गए। भारत सरकार के अनुसार, PLFS 2023-24 में 7 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी की साक्षरता दर 80.9 प्रतिशत रही। यह प्रगति महत्वपूर्ण है, लेकिन अभी भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा साक्षरता से वंचित है। हालांकि, इस आंकड़े की तुलना वैश्विक 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की वयस्क साक्षरता दर से सीधे करना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों की आयु-परिभाषाएं अलग हैं।
राज्यों के बीच बड़ा अंतर
भारत की साक्षरता कहानी को केवल राष्ट्रीय औसत से नहीं समझा जा सकता है। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच इसमें उल्लेखनीय अंतर है। PLFS 2023-24 के अनुसार 7 वर्ष और उससे अधिक आयु की साक्षरता दर मिजोरम में 98.2 प्रतिशत, लक्षद्वीप में 97.3 प्रतिशत, केरल में 95.3 प्रतिशत, त्रिपुरा में 93.7 प्रतिशत और गोवा में 93.6 प्रतिशत रही। वहीं बिहार में यह 74.3 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 75.2 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 72.6 प्रतिशत थी। राष्ट्रीय औसत 80.9 प्रतिशत रहा। ये आंकड़े बताते हैं कि साक्षरता केवल सरकारी योजनाओं से नहीं बढ़ती, बल्कि गरीबी, स्कूलों की उपलब्धता, महिला शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और प्रशासनिक क्षमता भी इसे प्रभावित करती हैं। इसलिए देश में साक्षरता बढ़ाने के लिए स्थानीय जरूरतों और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग रणनीतियां अपनाना जरूरी है।
ग्रामीण और शहरी भारत के बीच अंतर
साक्षरता के क्षेत्र में भारत के सामने ग्रामीण और शहरी अंतर भी बड़ी चुनौती है। शहरों में स्कूल, पुस्तकालय, इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा तक नियमित पहुंच कई परिवारों के लिए कठिन बनी हुई है। स्कूलों की दूरी, शिक्षकों की कमी, आर्थिक दबाव और डिजिटल सुविधाओं का अभाव बच्चों और वयस्कों की पढ़ाई को प्रभावित करता है। PLFS 2025 के अनुसार बिहार में 7 वर्ष और उससे अधिक आयु की ग्रामीण आबादी की साक्षरता दर 71.7 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्र में यह 83.9 प्रतिशत थी। यह अंतर केवल सुविधाओं की असमानता नहीं दिखाता, बल्कि शिक्षा के अवसरों में मौजूद क्षेत्रीय विषमता को भी सामने लाता है। इसलिए साक्षरता बढ़ाने के लिए स्कूलों की उपलब्धता के साथ शिक्षा की गुणवत्ता, डिजिटल पहुंच और स्थानीय जरूरतों पर भी समान ध्यान देना जरूरी है।
महिला साक्षरता : एक परिवार से पूरे समाज तक बदलाव
साक्षरता के क्षेत्र में महिला शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है। किसी महिला के शिक्षित होने का लाभ केवल उसे नहीं, बल्कि पूरे परिवार को मिलता है। शिक्षित महिला बच्चों की पढ़ाई के प्रति अधिक जागरूक होती है और स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता तथा परिवार नियोजन से जुड़े निर्णय बेहतर ढंग से ले सकती है। उसे सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल करने और आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने के अवसर भी बढ़ते हैं। दुनिया में आज भी निरक्षर वयस्कों में महिलाओं की हिस्सेदारी 63 प्रतिशत है, जो लैंगिक असमानता की गंभीर स्थिति को दर्शाती है। भारत में महिला साक्षरता में सुधार हुआ है, लेकिन कई राज्यों में पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर बना हुआ है। इसलिए केवल लड़कियों का स्कूल में दाखिला पर्याप्त नहीं है। उनकी शिक्षा पूरी कराना और गुणवत्तापूर्ण सीखने के अवसर सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
साक्षरता और गरीबी का संबंध
गरीबी और निरक्षरता एक-दूसरे को मजबूत करने वाला चक्र बन सकते हैं। गरीब परिवारों में बच्चों को पढ़ाई के बजाय काम में लगाने की मजबूरी पैदा हो सकती है। कम शिक्षा के कारण भविष्य में रोजगार के सीमित अवसर मिलते हैं और कम आय फिर अगली पीढ़ी की शिक्षा को प्रभावित करती है। इस चक्र को तोड़ने में साक्षरता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षा व्यक्ति को रोजगार के नए अवसरों तक पहुंच देती है और उसे कौशल हासिल करने में मदद करती है। इसलिए साक्षरता पर खर्च को केवल सामाजिक क्षेत्र का खर्च मानना सही नहीं होगा। यह भविष्य की आर्थिक क्षमता में निवेश भी है।
वित्तीय साक्षरता : बदलते भारत की जरूरत
आज केवल पढ़ना-लिखना जानना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति को यह भी समझना जरूरी है कि बैंक खाता कैसे संचालित होता है, डिजिटल भुगतान में क्या सावधानियां रखनी चाहिए, ऋण की शर्तें क्या हैं, बीमा क्यों जरूरी है और बचत का सही इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। वित्तीय साक्षरता खासकर ग्रामीण परिवारों, छोटे कारोबारियों, किसानों और महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है। यह उन्हें अनौपचारिक और जोखिमपूर्ण वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के साथ यह जिम्मेदारी और बढ़ गई है। तकनीक सुविधा देती है, लेकिन जानकारी की कमी होने पर वही तकनीक धोखाधड़ी का माध्यम भी बन सकती है।
डिजिटल साक्षरता : नई दुनिया की नई जरूरत
मोबाइल फोन और इंटरनेट ने ज्ञान तक पहुंच को आसान बनाया है। आज किसी व्यक्ति के पास स्मार्टफोन हो तो वह दुनिया के किसी भी हिस्से की जानकारी कुछ सेकंड में हासिल कर सकता है। लेकिन डिजिटल पहुंच और डिजिटल समझ एक ही चीज नहीं हैं। किसी व्यक्ति को मोबाइल चलाना आता हो, लेकिन वह फर्जी लिंक और वास्तविक वेबसाइट में अंतर न कर पाए, तो उसकी डिजिटल साक्षरता अधूरी है। इसी तरह सोशल मीडिया पर आने वाली हर सूचना को सच मान लेना भी जोखिमपूर्ण है। इसलिए डिजिटल साक्षरता में केवल तकनीक चलाना नहीं, बल्कि सुरक्षित, जिम्मेदार और समझदारी से तकनीक का उपयोग करना शामिल होना चाहिए।
फेक न्यूज के दौर में मीडिया साक्षरता
आज सूचना की कमी नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि सही सूचना और गलत सूचना में अंतर कैसे किया जाए। सोशल मीडिया के दौर में कोई अफवाह कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में मीडिया साक्षरता बेहद जरूरी हो जाती है। व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि सूचना का स्रोत क्या है, खबर कब प्रकाशित हुई, उसके पीछे प्रमाण क्या हैं और क्या अन्य विश्वसनीय स्रोत भी उसी बात की पुष्टि करते हैं। इसलिए आधुनिक साक्षरता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आलोचनात्मक सोच है। पढ़ना ही पर्याप्त नहीं; पढ़ी हुई बात पर सवाल करना और उसकी सत्यता जांचना भी जरूरी है।
एआई के दौर में साक्षरता का नया अर्थ
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने साक्षरता की परिभाषा के सामने एक नई चुनौती रख दी है। आज एआई किसी सवाल का उत्तर दे सकता है, लेख लिख सकता है, तस्वीर बना सकता है, अनुवाद कर सकता है और जानकारी को अलग-अलग रूप में प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन एआई से मिली जानकारी हमेशा सही हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए आने वाले समय में व्यक्ति को एआई का उपयोग करने के साथ-साथ उसकी सीमाओं को समझना भी होगा। भविष्य की साक्षरता में यह समझ शामिल हो सकती है कि एआई से सही सवाल कैसे पूछा जाए, उसके उत्तर की पुष्टि कैसे की जाए, निजी जानकारी साझा करने में किन बातों का ध्यान रखा जाए और मशीन से मिले उत्तर को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसका आलोचनात्मक मूल्यांकन कैसे किया जाए। यानी आने वाले वर्षों में एआई साक्षरता और डिजिटल विवेक शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।
साक्षरता और स्वास्थ्य
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी साक्षरता की भूमिका बहुत बड़ी है। डॉक्टर की सलाह समझना, दवा की खुराक और सावधानियां पढ़ना, स्वास्थ्य केंद्र की जानकारी हासिल करना, पोषण संबंधी निर्देश समझना और बीमारी से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी पहचानना इन सभी के लिए स्वास्थ्य साक्षरता जरूरी है। कोविड-19 महामारी ने भी यह दिखाया कि सही स्वास्थ्य सूचना तक पहुंच कितनी महत्वपूर्ण है। गलत जानकारी तेजी से फैल सकती है और लोगों को गलत निर्णय लेने के लिए प्रेरित कर सकती है। इसलिए साक्षरता को स्वास्थ्य नीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
वयस्क शिक्षा की जरूरत क्यों बनी हुई है?
स्कूल जाने की उम्र पार कर चुके लोगों को शिक्षा से जोड़ना भी साक्षरता अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बचपन में शिक्षा से वंचित रह जाना सीखने की संभावनाओं को समाप्त नहीं करता। इसी सोच के तहत भारत में ULLAS नव भारत साक्षरता कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जो 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के उन लोगों पर केंद्रित है, जिन्हें पर्याप्त औपचारिक शिक्षा नहीं मिल सकी। इसके पांच प्रमुख घटकों में बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान, जीवन कौशल, बुनियादी शिक्षा, व्यावसायिक कौशल और सतत शिक्षा शामिल हैं। कार्यक्रम में स्वयंसेवा को भी महत्व दिया गया है, जिससे विद्यार्थी, शिक्षक, उच्च शिक्षा संस्थानों से जुड़े लोग और समुदाय के सदस्य वयस्कों की सीखने में मदद कर सकते हैं। वयस्क शिक्षा को अक्षर ज्ञान के साथ जीवन कौशल और रोजगार से जोड़ना इसे अधिक उपयोगी और प्रभावी बनाता है।
मातृभाषा में शिक्षा का महत्व
भारत की भाषाई विविधता उसकी विशिष्ट पहचान है। बच्चे जिस भाषा में घर और समाज में बातचीत करते हैं, उस भाषा में शुरुआती शिक्षा उन्हें सीखने की प्रक्रिया से आसानी से जोड़ सकती है। स्थानीय भाषाओं और बोलियों में शिक्षण सामग्री तैयार करने से शिक्षा की पहुंच बढ़ सकती है। डिजिटल तकनीक ने इस दिशा में नई संभावनाएं पैदा की हैं। अब एक ही विषय को अलग-अलग भाषाओं में उपलब्ध कराना पहले की तुलना में आसान है। यह विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है जहां स्थानीय भाषा और औपचारिक शिक्षा की भाषा में काफी अंतर है।
साक्षरता और लोकतंत्र
लोकतंत्र में जागरूक नागरिकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। नागरिक को अपने अधिकारों, जिम्मेदारियों और संवैधानिक व्यवस्था की जानकारी होनी चाहिए। साक्षरता व्यक्ति को समाचार पढ़ने, सरकारी नीतियों को समझने और सार्वजनिक मुद्दों पर विचार बनाने की क्षमता देती है। इससे वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बन सकता है। आज के समय में यह जिम्मेदारी और बढ़ गई है, क्योंकि सोशल मीडिया के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सूचनाएं तेजी से फैलती हैं। ऐसे में आलोचनात्मक सोच और सूचना की सत्यता जांचने की क्षमता लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है।
शिक्षा की गुणवत्ता : अगली बड़ी चुनौती
भारत और दुनिया के सामने अब केवल स्कूलों में बच्चों को पहुंचाने की चुनौती नहीं है। अगली बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे वास्तव में सीखें भी। संयुक्त राष्ट्र की SDG रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक शिक्षा व्यवस्था में प्रगति की गति धीमी है और सीखने के परिणामों को लेकर चिंता बनी हुई है। 2024 में दुनिया में 273 मिलियन बच्चे और युवा स्कूल से बाहर थे। साथ ही, अनेक देशों में बुनियादी पढ़ने और गणित की क्षमता से जुड़ी कमियां बनी हुई हैं। इसलिए शिक्षा का लक्ष्य केवल नामांकन नहीं, बल्कि सीखने की वास्तविक क्षमता होना चाहिए।
साक्षरता और सतत विकास
संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य में लक्ष्य संख्या 4 गुणवत्तापूर्ण, समावेशी और समान शिक्षा सुनिश्चित करने की बात करता है। इसके लक्ष्य 4.6 में 2030 तक सभी युवाओं और पर्याप्त संख्या में वयस्कों को साक्षर और संख्यात्मक रूप से सक्षम बनाने का लक्ष्य रखा गया है। साक्षरता का संबंध केवल शिक्षा से नहीं है। इसका सीधा संबंध गरीबी कम करने, रोजगार बढ़ाने, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सुधारने और सामाजिक असमानता घटाने से है। यानी अगर किसी देश को टिकाऊ विकास हासिल करना है, तो उसे साक्षरता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को अपनी विकास रणनीति के केंद्र में रखना होगा।
आगे की राह : साक्षरता से ज्ञान समाज तक
आने वाले समय में साक्षरता अभियान को पांच प्रमुख दिशाओं में आगे बढ़ाने की जरूरत होगी। पहली, हर व्यक्ति के लिए बुनियादी पढ़ने-लिखने और गणना की क्षमता सुनिश्चित करना। दूसरी, बच्चों के लिए स्कूल में प्रवेश के साथ गुणवत्तापूर्ण सीखने पर ध्यान देना। तीसरी, महिलाओं, ग्रामीण समुदायों, वंचित समूहों और दिव्यांग लोगों के लिए विशेष अवसर उपलब्ध कराना। चौथी, डिजिटल, वित्तीय, स्वास्थ्य और मीडिया साक्षरता को शिक्षा का हिस्सा बनाना। और पांचवीं, एआई तथा नई तकनीकों के दौर में आलोचनात्मक सोच और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा देना। भारत के लिए यह काम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश एक साथ कई स्तरों पर बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ करोड़ों युवा नई अर्थव्यवस्था के अवसरों की ओर बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर बड़ी संख्या में वयस्कों को अभी भी बुनियादी साक्षरता और जीवन कौशल की जरूरत है।
जब अक्षर-ज्ञान से जीवन की राह संवरती है
अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस केवल यह याद करने का अवसर नहीं है कि दुनिया में कितने लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते, बल्कि यह समझने का दिन है कि शिक्षा व्यक्ति और समाज को किस तरह बदलती है। साक्षरता की शुरुआत अक्षर ज्ञान से होती है, लेकिन इसका उद्देश्य जीवन को समझने, अधिकारों को पहचानने और बेहतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है। पढ़ना सीखने वाला व्यक्ति किताबों के साथ अपने अधिकारों, अवसरों और संभावनाओं को भी समझने लगता है, जबकि लिखने की क्षमता उसे विचारों और आकांक्षाओं को व्यक्त करने का आत्मविश्वास देती है।
दुनिया में वयस्क साक्षरता दर 88 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, फिर भी 754 मिलियन वयस्कों का निरक्षर रहना बताता है कि यह यात्रा अभी अधूरी है। इनमें महिलाओं की 63 प्रतिशत हिस्सेदारी लैंगिक असमानता की गंभीर चुनौती सामने लाती है। भारत में 7 वर्ष और उससे अधिक आयु की साक्षरता दर 80.9 प्रतिशत होना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन राज्यों और ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर अभी बना हुआ है। आज साक्षरता का अर्थ डिजिटल दुनिया को समझना, सूचना की सत्यता परखना, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेना तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों का जिम्मेदारी से उपयोग करना भी है। इसलिए साक्षरता प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की क्षमता है।
