रायपुर, 15 अक्टूबर । छत्तीसगढ़ के भिलाई के प्रसिद्ध सूक्ष्म मूर्तिकार (माइक्रो स्कल्पचर) डॉ. अंकुश देवांगन ने नवरात्रि के अवसर पर दुनिया की सबसे छोटी मां दुर्गा की मूर्ति का निर्माण किया है। संगमरमर पत्थर को तराशकर बनाई गई इस कलाकृति का आकार मात्र आधे सेंटीमीटर यानी चने के दाने के बराबर है।
उंगली के छोटे से नाखून पर प्रदर्शित मां दुर्गा की यह मूर्ति सिंह पर विराजमान है, जिसके आठों हाथ में खड्ग, तलवार, त्रिशूल, गदा और विभिन्न आयुध विद्यमान हैं। इससे पहले उन्होंने मात्र 0.4 मिमी की भगवान गणेश की माइक्रो मूर्ति बनाकर लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया था।
डॉ. अंकुश देवांगन छत्तीसगढ़ के भिलाई के रहने वाले एक सुप्रसिद्ध समकालीन मूर्तिकार, शिल्पकार और माइक्रो-आर्टिस्ट (सूक्ष्म मूर्तिकार) हैं। वे अपनी अनोखी और अद्भुत कलाकृतियों के लिए न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि पूरे देश-दुनिया में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की भी अत्यंत सूक्ष्म मूर्तियां बनाई हैं। उन्होंने चावल के दानों और संगमरमर के पत्थरों पर 5,000 से अधिक सूक्ष्म मूर्तियों का निर्माण किया है।
सुप्रसिद्ध समकालीन मूर्तिकार, शिल्पकार डॉ. अंकुश देवांगन ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में बताया कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकगाथाओं को काॅमिक्स रूप में परिणित करके बनाई गई कृतियों को गोल्डन बुक ऑफ द वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया है, जिसका उद्घाटन तत्कालीन महान राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था। वे मदकूद्वीप में मांडूक्य ऋषि, सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय क्राफ्ट मेला, हरियाणा में अनेकानेक भव्य प्रतिमाएं बना चुके हैं। इसके अलावा राजभवन भोपाल में कलाकृतियां, दुर्गापुर स्टील प्लांट पश्चिम बंगाल में सैकड़ों भव्यतम प्रतिमाएं, भिलाई सिविक सेंटर की पहचान कृष्ण अर्जुन रथ तथा अनेक चौक चौराहों पर बनी कालजयी प्रतिमाएं उनकी पहचान है। उनके कला की खासियत है कि उन्होंने जहां-जहां भी कलाकृतियां बनाई हैं कालान्तर में वे सभी स्थान दर्शनीय स्थल के रूप में प्रसिद्ध हो गए हैं।
उनकी कला साधना को देखते हुए भारत सरकार, संस्कृति मंत्रालय ने ललित कला अकादमी, नई दिल्ली की मानद सदस्यता प्रदान की है। जहां वे राज्य से प्रथम बोर्ड मेंबर बने हैं। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य में ‘ललित कला अकादमी रीजनल सेंटर’ की स्थापना के लिए गठित कमेटी का उन्हें चेयरमैन नियुक्त किया गया है। वे सूक्ष्म कलाकृतियों का निर्माण निरंतर करते रहते हैं। और अपनी कलाओं के माध्यम से सामाजिक सरोकार के संदेश भी देते हैं। वे चावल के दानों, आलपिन की नोंक, सुई (नीडिल), ब्लेड और 5 मिमी जितने छोटे संगमरमर के पत्थरों पर मूर्तियां उकेरते हैं। इन सूक्ष्म मूर्तियों को सामान्य आंखों से देखना मुश्किल होता है, इन्हें देखने के लिए माइक्रो पावर लेंस या मैग्नीफाइंग ग्लास की जरूरत होती है।
डॉ. अंकुश ने बताया कि भारत में तेजी से बढ़ते जल प्रदूषण को रोकने के लिए उन्होंने इस दुनिया की सबसे छोटी मां दुर्गा की मूर्ति के माध्यम से संदेश दिया है कि छोटी प्रतिमाओं का ही निर्माण करना चाहिए। ताकि जल प्रदूषण कम हो सके। वर्तमान में वे भिलाई इस्पात संयंत्र के मेडिकल विभाग में कार्यरत हैं।
मूर्ति और भित्तिचित्र में रविशंकर वि.वि. से डॉक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त 10 विषयों में स्नातकोत्तर डॉ. अंकुश ने बताया कि उनकी यह कला जन्मजात है।छत्तीसगढ़ की श्रमिक बस्तियों और लौह उत्पादन के लिए जाने वाले दल्ली राजहरा में उनका जन्म हुआ। जिस बस्ती में वे रहते थे, वह गरीबों की थी।गणेश पूजा पर वे बचपन में स्वयं ही ईश्वरीय प्रेरणा से मूर्तियां बनाया करते थे। उन्होंने बताया कि उनके साथ के बच्चे संग-संग मूर्ति बनाया करते थे। उन्होंने ध्यान दिया इन बच्चों ने कभी भी आपराधिक गतिविधियों में न तो भाग लिया और ना ही उसकी तरफ आकर्षित हुए। शायद यह कला की सृजनात्मकता का ही असर था। उन्होंने कहा की कि सृजन की यह यात्रा उनकी जारी है और आगे भी रहेगी।
उन्होंने भिलाई में कटे हुए पेड़ों को उल्टा लगाकर प्रकृति को बचाने का एक अनोखा और सीधा संदेश देने वाला आर्ट इंस्टॉलेशन भी तैयार किया था।
वे अब तक चावल और पत्थरों पर 5,000 से भी अधिक सूक्ष्म आकृतियां (जैसे ताजमहल, स्टैचू ऑफ लिबर्टी आदि) बना चुके हैं और वर्तमान में दुनिया की सबसे छोटी ‘रामसेतु प्रतिकृति’ बनाने पर काम कर रहे हैं।
गौरतलब है कि समकालीन भारतीय कलाजगत के सशक्त स्तंभ अंकुश देवांगन ने अपने सूक्ष्मकला की शुरुआत 1985 से की थी। वहीं 1989 में चीन के तियानमेन चौक में प्रजातंत्र की मांग कर रहे हजारों छात्रों के नरसंहार के बाद उन्होंने बस्तर के धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा छोड़ो कला से नाता जोड़ो आंदोलन शुरू किया था, जो विगत 36 वर्षों से जारी है। पौराणिक आख्यानों में दर्ज कला आनंदम ददाति से प्रेरणा लेकर उन्होंने सृजनात्मक विचारों से हिंसात्मक विचारों के नाश का प्रयास किया। जो सदैव कारगर साबित हुआ है। परिणामस्वरूप उन्होंने बच्चों को कला के प्रति आकर्षित करने के लिए इन सूक्ष्मकलाओं का निर्माण किया। ताकि बच्चे सृजनशील, शिक्षित, सक्षम बन सकें और माओवादी विचारधारा में न जाएं। इसका व्यापक प्रभाव पड़ा और हजारों बच्चे पढ़ लिखकर अपना जीवन संवारने में सफल हुए हैं।
डॉ. अंकुश ने हर धर्म के देवी देवताओं, महापुरुषों और ऐतिहासिक इमारतों की सूक्ष्मतम तस्वीरें बनाई है। 2003 में उन्हें इन सूक्ष्मकलाओं के लिए प्रतिष्ठित लिम्का बुक ऑफ द रिकॉर्ड का नेशनल अवार्ड भी मिल चुका है। सूक्ष्म के अलावा वे विशाल से विशालतम कलाकृतियों के लिए भी जाने जाते हैं। सूक्ष्म कला के साथ-साथ उन्होंने विशालकाय संरचनाएं भी बनाई हैं। दल्लीराजहरा में भिलाई स्टील प्लांट के लोहे के कबाड़ (स्क्रैप) से बना 64 फीट ऊंचा लोहे का रथ(दुनिया का सबसे बड़ा लौहरथ) उन्हीं की देन है। इसके अलावा, रायपुर के ‘पुरखौती मुक्तांगन’ में सबसे लंबा भित्तिचित्र बनाने का श्रेय भी उन्हें जाता है। जिसे विश्व का सबसे बड़ा लौहरथ माना जाता है। रायपुर पुरखौती मुक्तांगन के वे संस्थापक सदस्य रहे हैं और यहां के हजारों मीटर दीवारों पर उन्होंने लोकशैली के भित्तिचित्रों को उकेरा है।
