इजरायल चुनाव 2026 में सबसे बड़ा मुकाबला प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट के बीच माना जा रहा है। हमास हमले के बाद गाजा, लेबनान और ईरान में तीन साल चली जंग के बाद यह देश का पहला आम चुनाव है। इसलिए इसे हाल के इतिहास का सबसे अहम चुनाव कहा जा रहा है।
नेतन्याहू के लिए दांव बड़ा है
नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक रहे प्रधानमंत्री हैं और अब एक और कार्यकाल की दौड़ में हैं। उनके सामने आइसेनकोट की अगुवाई वाला गुट खड़ा है। आइसेनकोट की यशार पार्टी को लोगों का अच्छा समर्थन मिलता दिख रहा है। प्रचार थमने से ठीक पहले आए आखिरी सर्वे में यशार पार्टी, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से थोड़ी आगे है। लेकिन कोई भी खेमा 61 सीटों के बहुमत तक पहुंचता नहीं दिख रहा है। नेतन्याहू के गुट को करीब 50 सीटें मिलने का अनुमान है। विपक्ष के खाते में 52 से 56 सीटें जा सकती है। अरब पार्टियों को 14 से 16 सीटें मिलने की बात कही जा रही है और सरकार बनाने में यही निर्णायक हो सकती है।
इजरायल के एक न्यूज सर्वे के अनुसार, वोटरों के लिए अर्थव्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है। उन्हें 34 प्रतिशत लोगों को चुना। सुरक्षा 32 फीसदी के साथ दूसरे नंबर पर है। अति रूढ़िवादी पुरुषों की सेना में अनिवार्य भर्ती का सवाल भी चर्चा में है।
भारत से कितना अलग है इजरायल का वोटिंग सिस्टम
भारत में हम अपने इलाके के उम्मीदवार को वोट देते हैं। लेकिन इजरायल में ऐसा नहीं होता है। वहां पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र है और लोग किसी स्थानीय चेहरे की जगह सीधे पार्टी चुनते हैं। वोट डालने का तरीका भी अलग है। वोटर कार्डबोर्ड की आड़ में पार्टी के हिब्रू अक्षरों वाली पर्ची चुनता है। उसे लिफाफे में बंद करता है और बैलट बॉक्स में डाल देता है। वहां ईवीएम का इस्तेमाल नहीं होता है।
संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। सीट पाने के लिए किसी पार्टी को कुल राष्ट्रीय वोट का कम से कम 3.25 प्रतिशत हिस्सा चाहिए। सरकार बनाने के लिए 61 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। आज तक किसी अकेली पार्टी को बहुमत नहीं मिला। इसलिए वहां हमेशा गठबंधन की सरकार बनती है।
नतीजे और सरकार बनने की प्रक्रिया
आखिरी वोट पड़ते ही गिनती शुरू हो जाती है। इसके लिए 28 अक्टूबर तक तस्वीर साफ होने की उम्मीद है, हालांकि अधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को आएंगे। इसके बाद राष्ट्रपति किसी एक नेता को सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे। उसे 28 दिन मिलेंगे और जरूरत पड़ी तो 14 दिन और बढ़ाए जा सकते हैं। इस दौरान सरकार न बन सके तो फिर चुनाव हो सकता है। तब तक मौजूदा सरकार कार्यवाहक के तौर पर काम करती रहेगी।
भारत और इजरायल के रिश्ते
भारत और इजरायल के बीच 1992 से पूर्ण राजनयिक संबंध हैं। भारत में इजरायली दूतावास के प्रवक्ता मिशेल सेरोटा के अनुसार इजरायल में इस पर पूरी सहमति है कि भारत एक अहम रणनीतिक साझेदार है चाहे सत्ता में कोई भी आए। बता दें कि मंगलवार को वोटिंग 61 सीटों का आंकड़ा किसी के पास नहीं है।
