नई दिल्ली। शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्था संस्कार ने सोमवार को रोहिणी के सेक्टर-14 स्थित टेक्नीआ इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के प्रांगण में भारत का नवनिर्माण : शिक्षा में स्वत्व विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बनाने के साथ ही पूर्व की भांति शिक्षा और ज्ञान का अग्रणी वैश्विक केंद्र बनाने के लिए हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को परंपरागत स्वरूप में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम बढ़ना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने शिक्षा प्रणाली में आत्मविश्वास और स्वदेशी ज्ञान को प्राथमिकता दें।
वक्ताओं ने इसके लिए युवाओं को भारत की संस्कृति, परंपराओं और इतिहास से जुड़ने के महत्व को समझाया। साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता और समावेशिता पर जोर देते हुए कार्यक्रम में यह बात भी समाने आई कि कैसे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)2020 छात्रों को अधिक स्वतंत्र और बहुआयामी तरीके से सोचने-समझने की क्षमता प्रदान करने की दिशा में काम कर रही है। इसका उद्देश्य न केवल विद्यार्थियों के ज्ञान में वृद्धि करना है, बल्कि उन्हें समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनाने का भी है।
संस्कार की उत्तरी दिल्ली शाखा द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता विशाल थे। अपने संबोधन में विशाल ने बताया कि वास्तव में नई शिक्षा नीति भारत के संस्कारों को केंद्र में रखकर बनाई गई है लेकिन उसके अतिरिक्त भी कुछ और प्रयत्न किए जाने चाहिए जिनका समावेश संस्कार ने किया है। संस्कार के संस्कृति और परंपरा से जुड़े विषयों को न केवल देश के सभी शिक्षण संस्थानों, विद्यालयों और अन्य संस्थानों में लेकर जाने की आवश्यकता है बल्कि विद्यार्थियों, अध्यापकों और अभिभावकों के बीच भी पहुंचाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि संस्कार का प्रारंभ परिवार से ही होता है और उन्नति एवं प्रगति के लिए शिक्षण और संस्कार का निर्माण लगातार जारी रहना चाहिए क्योंकि यह रुकते ही अधोपतन और संकुचन आरंभ हो जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं है बल्कि स्वामी विवेकानंद के अनुसार मनुष्य के अंदर जो दिव्यता है उसका प्रकटीकरण ही शिक्षा है। अक्षर ज्ञान से बहुत आगे बढ़कर शिक्षा मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्यों के प्रति प्रेरित करने और इस जन्म मरण के बंधन से मुक्त करने वाली है। शिक्षा केवल मात्र पैसा कमाने लायक बनाने के लिए नहीं है बल्कि इसमें संस्कार और संस्कृति के समावेश से ही वास्तविक उन्नति और उत्थान संभव है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दिल्ली सरकार की उप शिक्षा निदेशक रेनू छिकारा ने संस्कार के निर्माण के लिए विद्यालय और परिवार को बराबर जिम्मेदारी लेने की अपील की।
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली सरकार के उप शिक्षा निदेशक डॉ राकेश राही ने कहा कि हमारे संस्कार और संस्कृति का मूल मंत्र सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया और वसुधैव कुटुंबकम पर आधारित है। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों का समावेश हो ताकि वास्तविक रूप से समग्र विकास की ओर आगे बढ़ा जाए।
