राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय में 23 जुलाई तक चलेगी अनूठी प्रदर्शनी
नई दिल्ली, 14 जुलाई । एशिया की सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक एकता का अद्वितीय चित्रण करती ‘प्रतिरूप : एशिया की सांस्कृतिक समन्विति में मुखौटे’ नामक विशेष प्रदर्शनी इन दिनों राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय, दिल्ली में दर्शकों को आकर्षित कर रही है। यह प्रदर्शनी 23 जुलाई तक चलेगी और इसमें भारत, कोरिया, वियतनाम, श्रीलंका, तिब्बत, थाईलैंड, चीन और म्यांमार से लाए गए पारंपरिक मुखौटों को प्रदर्शित किया गया है।
विगत शनिवार को प्रदर्शनी का उद्घाटन यूनेस्को की संस्कृति प्रमुख जुन्ही हान और भारत सरकार के राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रो. केके बासा ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर यूनेस्को दिल्ली के निदेशक टिम कर्टिस, ओडी कला केंद्र, ओडिशा के संस्थापक पीके दाश, विख्यात कलाकार जतिन दास, संगीत नाटक अकादमी की पूर्व सचिव हेलेन आचार्य तथा अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
प्रदर्शनी का आयोजन राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय, पूर्वाशा फोक एंड ट्राइबल आर्ट म्यूज़ियम, और ओड़ी आर्ट सेंटर, ओडिशा के संयुक्त प्रयास से किया गया है। प्रदर्शनी का संयोजन राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय की उपनिदेशक निधि कामरा और ओडी कला केंद्र की अंतरराष्ट्रीय क्यूरेटर एवं एशियाई लोक एवं परंपरा संस्कृति अनुसंधान संस्थान (सीआरआईएएफटी) की निदेशक पार्क येओन ओक के निर्देशन में किया गया है।
प्रदर्शित मुखौटे केवल सौंदर्यशास्त्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि वे धार्मिक अनुष्ठानों, आत्मिक विश्वासों, लोकनाट्य परंपराओं और पारंपरिक रंगमंच की जीवंतता का प्रतीक हैं। हर मुखौटा एक कहानी कहता है—एक ऐसी कहानी जो समय और सीमाओं से परे, पूरे एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत को जोड़ती है।
उद्घाटन के अवसर पर जुन्ही हान ने कहा, “जब दुनिया विभिन्न मतभेदों से जूझ रही है, यह प्रदर्शनी हमें हमारी साझा सांस्कृतिक जड़ों की याद दिलाती है। मुखौटे केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि पहचान, स्मृति और परंपरा के जीवंत प्रतीक हैं।”
प्रो. के. के. बासा ने कहा, “हमारी अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ऐसे आयोजन अत्यंत आवश्यक हैं। ‘प्रतिरूप’ इस दिशा में एक प्रेरणादायी कदम है।”
‘प्रतिरूप’ न केवल एक कला प्रदर्शनी है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक संवाद है—जो आज की पीढ़ी को अपने अतीत से जोड़ने और एशिया की आत्मा से जुड़ने का निमंत्रण देता है।
