भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक विकसित की है, जिससे पूर्वी हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़े खतरों की पहले से पहचान की जा सकेगी। इस तकनीक के जरिए वैज्ञानिकों ने ऐसे 492 स्थानों की पहचान की है, जहां भविष्य में ग्लेशियल झीलें बनने की संभावना है।
यह शोध हाई-रिज़ॉल्यूशन गूगल अर्थ सैटेलाइट तस्वीरों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल की मदद से किया गया है। इससे पहाड़ी इलाकों में जल संसाधन प्रबंधन और आपदा जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।
शोध में विकसित मॉडल ने इलाके की जटिल भौगोलिक संरचना को समझने और संभावित जोखिमों का सटीक अनुमान लगाने में मदद की है, जिससे भविष्यवाणियां अधिक भरोसेमंद बनी हैं।
इस नई प्रणाली की मदद से उन क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां ग्लेशियर पिघलने के कारण नई झीलें बन सकती हैं। ऐसे इलाकों में विशेष निगरानी और समय रहते रोकथाम के उपाय किए जा सकते हैं।
IIT गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर प्रो. अजय डाशोरा ने कहा कि यह तकनीक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी गंभीर आपदाओं के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम विकसित करने में मदद करेगी। इससे सड़कें, जलविद्युत परियोजनाएं और बस्तियां सुरक्षित स्थानों पर विकसित की जा सकेंगी।
उन्होंने बताया कि यह ढांचा न केवल आपदा प्रबंधन में सहायक है, बल्कि यह समझने में भी मदद करेगा कि ग्लेशियरों के पीछे हटने से जल प्रणालियों में भविष्य में कैसे बदलाव आ सकते हैं। यह तकनीक दुनिया के अन्य हिमनद क्षेत्रों में भी अपनाई जा सकती है।
यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल Nature Scientific Reports में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन से यह भी सामने आया है कि जमीन की बनावट और ढलान जैसी विशेषताएं, जिन्हें पहले नजरअंदाज किया जाता था, ग्लेशियल झील बनने में अहम भूमिका निभाती हैं।
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने तीन अलग-अलग तकनीकों का परीक्षण किया—लॉजिस्टिक रिग्रेशन, आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क और बेयesian न्यूरल नेटवर्क। इनमें बेयesian न्यूरल नेटवर्क सबसे सटीक साबित हुआ।
शोधकर्ताओं के अनुसार, पास की मौजूदा झीलें, हल्की ढलान, पीछे हटते ग्लेशियर और भूमि की विशेष बनावट ग्लेशियल झील बनने के सबसे बड़े संकेतक हैं।
आगे चलकर शोध टीम इस मॉडल में और सुधार करने की योजना बना रही है, जिसमें मोरेन (ग्लेशियर द्वारा छोड़ी गई चट्टानें) का अध्ययन, डेटा प्रक्रिया को स्वचालित करना और फील्ड स्तर पर जांच शामिल है। इससे यह तकनीक बड़े स्तर पर ग्लेशियर से जुड़े खतरों की निगरानी के लिए और अधिक उपयोगी बन सकेगी।
