भारत की 10.4 करोड़ अनुसूचित जनजातियों में से बड़ी संख्या की वार्षिक आय का 20% से 40% हिस्सा लघु वन उपज (एमएफपी) से आता है। लंबे समय से आदिवासी समुदाय अपनी उपज बिचौलियों को कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (पीएमजेवीएम) चला रही है। मिशन के तहत आदिवासी समुदायों को वन धन विकास केंद्रों (वीडीवीके) के माध्यम से संगठित कर उन्हें केवल कच्चे उत्पाद बेचने वाले संग्रहकर्ताओं से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने वाले उद्यमियों में बदलने का प्रयास किया जा रहा है। अब तक 4,172 वन धन विकास केंद्रों को मंजूरी दी गई है और इनमें 12.48 लाख जनजातीय सदस्य जुड़े हैं।
लघु वन उपज बनी आजीविका का प्रमुख आधार
शहद, तेंदू के पत्ते, महुआ के फूल, इमली, लाख, बांस और जंगली जड़ी-बूटियां जैसे लघु वन उपज लाखों वनवासी आदिवासी परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार हैं। इन उत्पादों की बिक्री से कई परिवारों की वार्षिक आय का 20% से 40% हिस्सा आता है। हालांकि, सीधे खरीद-बिक्री की व्यवस्था होने के बावजूद आदिवासी संग्रहकर्ताओं को कई बार उत्पाद के वास्तविक बाजार मूल्य का केवल एक हिस्सा ही मिल पाता है। बिचौलियों की भूमिका के कारण उन्हें कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है।
पीएमजेवीएम बदल रहा है पुरानी व्यवस्था
2021-22 में शुरू किया गया प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन लघु वन उपज के मूल्यवर्धन के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था उपलब्ध कराता है। इसके तहत आदिवासी समुदायों को नई तकनीक, बेहतर प्रसंस्करण और व्यावसायिक तौर-तरीकों का प्रशिक्षण दिया जाता है। योजना का उद्देश्य समुदायों को राष्ट्रीय और डिजिटल बाजारों से जोड़कर उनके उत्पादों की पहुंच और बिक्री बढ़ाना है। इसके साथ ही सरकार निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर लघु वन उपज की खरीद भी करती है।
वन अधिकार कानून से मिले खरीद-बिक्री के अधिकार
2006 में लागू अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, जिसे वन अधिकार अधिनियम भी कहा जाता है, लघु वन उपज के संबंध में वनवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देता है। इसमें बांस, बेंत, टसर, कोकून, शहद, मोम, लाख, तेंदू या केंदू के पत्ते, औषधीय पौधे, जड़ी-बूटियां, जड़ें और कंद सहित विभिन्न गैर-लकड़ी वन उत्पादों को लघु वन उपज के दायरे में रखा गया है।
87 लघु वन उपज के लिए एमएसपी
सरकार ने पीएमजेवीएम के तहत 87 लघु वन उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य अधिसूचित किया है। वन अधिकार अधिनियम वनवासी समुदायों को गैर-लकड़ी लघु वन उपज की खरीद और बिक्री का अधिकार देता है। इसके अलावा, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के तहत जनजातीय ग्राम पंचायतों को लघु वन उपज पर स्वामित्व अधिकार प्रदान किए गए हैं।
ट्राइफेड की अहम भूमिका
भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ (ट्राइफेड) को जनजातीय उत्पादों के विपणन और विकास की जिम्मेदारी दी गई है। यह निर्धारित मूल्य पर गैर-लकड़ी वन उपज खरीदता है और राज्य स्तर की कार्यान्वयन एजेंसियों, जनजातीय विकास सहकारी समितियों तथा वन विकास निगमों के नेटवर्क के माध्यम से खरीद प्रक्रिया संचालित करता है। 2013-14 से राज्य सरकारों ने इस योजना के तहत 693.98 करोड़ रुपए मूल्य की 2,67,954 मीट्रिक टन लघु वन उपज खरीदी है।
वन धन विकास केंद्रों से जुड़ रहे आदिवासी
पीएमजेवीएम के तहत आदिवासी संग्रहकर्ताओं को स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित किया जाता है। करीब 300 आदिवासी सदस्यों वाले 15 एसएचजी के समूह को एक वन धन विकास केंद्र से जोड़ा जाता है। प्रत्येक वीडीवीके में कम से कम 60% सदस्य अनुसूचित जनजाति समुदायों से होना जरूरी है।
वन धन योजना बनी पीएमजेवीएम का आधार
14 अप्रैल 2018 को शुरू की गई वन धन योजना पीएमजेवीएम का हिस्सा है। यह वीडीवीके मॉडल की नींव तैयार करती है और जनजातीय समुदायों के बीच इसके क्रियान्वयन को गति देती है। इसका मुख्य उद्देश्य वन उपज संग्रहकर्ताओं को संगठित कर उन्हें सामुदायिक स्तर पर प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन के अवसर उपलब्ध कराना है।
कौशल, तकनीक और वित्तीय सहायता
सरकार वीडीवीके के माध्यम से एमएफपी संग्रहकर्ताओं को वैज्ञानिक तरीके से उपज संग्रह करने समेत विभिन्न कौशल का प्रशिक्षण देती है। एसएचजी को लाभार्थियों के घर या सरकारी अथवा ग्राम पंचायत भवन में बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जाता है। स्थानीय लघु वन उपज के अनुसार काटने और छानने के उपकरण, डिकॉर्टिकेटर, ड्रायर और पैकेजिंग उपकरण भी उपलब्ध कराए जाते हैं। लगभग 30 सदस्यों को टिकाऊ संग्रह और मूल्यवर्धन का प्रशिक्षण, कच्चा माल और प्रशिक्षु किट प्रदान किए जाते हैं। वित्तीय संस्थानों, बैंकों और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम (NSTFDC) से जोड़कर कार्यशील पूंजी की सुविधा दी जाती है। जरूरत के अनुसार किराये पर भंडारण और परिवहन सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है।
स्थानीय हाट से ई-कॉमर्स तक बाजार से जुड़ाव
वन धन विकास केंद्रों को प्राथमिक लघु वन उपज खरीद केंद्रों और स्थानीय हाट बाजारों के आसपास स्थापित किया जाता है, जिससे आदिवासी समुदायों को अपनी उपज बेचने में सुविधा हो। आदिवासी क्षेत्रों में 5,000 से अधिक हाट हैं। इनका चरणबद्ध तरीके से स्थायी संरचनाओं, भंडारण, पेयजल, छाया और वजन उपकरण जैसी सुविधाओं के साथ आधुनिकीकरण किया जा रहा है। वीडीवीके अपने उत्पादों के मूल्यवर्धन और विपणन के लिए निजी संस्थाओं या गैर-लाभकारी संगठनों के साथ साझेदारी भी कर सकते हैं। ट्राइफेड वीडीवीके को बाजार की जानकारी उपलब्ध कराता है, जिसमें दैनिक बाजार दरें और ई-कॉमर्स के अवसर शामिल हैं। इससे केंद्र बेहतर व्यावसायिक निर्णय ले सकते हैं।
ब्रांडिंग और डिजिटल बाजार पर जोर
पीएमजेवीएम के तहत जनजातीय उत्पादों की ब्रांडिंग, प्रचार और विज्ञापन के लिए त्योहारों, प्रदर्शनियों और कारीगर मेलों का उपयोग किया जाता है। वीडीवीके और योजना की अन्य परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग, जनजातीय उत्पादों के लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई), आईटी एवं ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के निर्माण और उन्नयन तथा अनुसंधान एवं विकास के लिए भी सहायता दी जाती है।
4,172 वीडीवीके स्वीकृत, 2,911 केंद्र सक्रिय
31 जुलाई 2026 तक पीएमजेवीएम के तहत 4,172 वन धन विकास केंद्र स्वीकृत किए गए हैं। इनमें से 2,911 केंद्र कार्यरत हैं और इनकी बिक्री करीब 168 करोड़ रुपए रही है। कुल 12.48 लाख जनजातीय सदस्य वन धन विकास केंद्रों से जुड़े हैं।
महिला सशक्तिकरण का माध्यम बने वीडीवीके
वन उपजों के संग्रह और बिक्री में बड़ी संख्या में महिलाएं सक्रिय रहती हैं। ऐसे में पीएमजेवीएम आदिवासी महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। वीडीवीके मॉडल के जरिए महिलाएं केवल श्रमिक के रूप में नहीं, बल्कि सामुदायिक उद्यमों की मालिक और हिस्सेदार के रूप में भी भूमिका निभा रही हैं।
अरुणाचल प्रदेश में महिला समूह ने तैयार किए मूल्यवर्धित उत्पाद
अरुणाचल प्रदेश के लेपराडा जिले में न्यगामाने, हो योर्बे, मेदुमहगदुम वन धन विकास केंद्र की स्थापना अक्टूबर 2021 में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 300 महिला सदस्यों और किसानों के साथ की गई थी। केंद्र स्थानीय गैर-लकड़ी वन और कृषि उपज को बाजार योग्य उत्पादों में बदलता है। यहां किंग चिली यानी भूत जोलोकिया का अचार, बांस की टहनियों का अचार, स्थानीय हल्दी से हल्दी पाउडर, अदरक से अदरक पाउडर, अनानास जैम, अनानास स्क्वैश और ऑरेंज स्क्वैश जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। 2022-23 से इन उत्पादों की करीब 11 लाख रुपए की बिक्री हो चुकी है। इससे महिलाओं को मौसमी कृषि पर निर्भरता कम करने और पूरे वर्ष आय अर्जित करने का अवसर मिला है।
सामुदायिक स्वामित्व से टिकाऊ वन अर्थव्यवस्था की ओर
प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन गैर-लकड़ी वन उपज के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन के लिए व्यवस्थित व्यवस्था उपलब्ध कराते हुए वनवासी आदिवासी समुदायों के लिए आजीविका के नए अवसर तैयार कर रहा है। इन उत्पादों का संबंध स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान से है। पीएमजेवीएम सामुदायिक स्वामित्व को बाजार प्रतिस्पर्धा से जोड़कर वन आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। प्राकृतिक और समुदाय-स्वामित्व वाले वन उत्पादों को बड़े बाजारों से जोड़ने की यह पहल जनजातीय समुदायों की आय बढ़ाने के साथ उनके उद्यमिता कौशल को भी मजबूत कर सकती है। यह प्रयास समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में जनजातीय समुदायों की भागीदारी को मजबूत करने में योगदान दे सकता है।
