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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक सुभाषित साझा किया। उन्होंने संस्कृत श्लोक, “उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥” साझा करते हुए इसका हिंदी अर्थ भी बताया। श्लोक का भाव है कि उत्तम व्यक्तियों की संगति, विद्वानों के साथ सत्संवाद तथा निःस्वार्थ और निर्लोभी व्यक्तियों के साथ मित्रता करने वाला व्यक्ति कभी दुःखी नहीं होता।
करुणा और संतोष का संदेश
इससे एक दिन पहले सोमवार को प्रधानमंत्री ने सुभाषित साझा करते हुए लिखा था, “करुणा से आत्म-सम्मान और संतोष से सच्ची खुशी मिलती है। इसी भाव से समाज में सहयोग और सद्भाव की डोर और सशक्त होती है।”
आलस्य और आशंकाओं पर विजय
प्रधानमंत्री ने संस्कृत श्लोक, “कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥” भी साझा किया था। इसका हिंदी अर्थ है कि दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखने से आत्म-सम्मान प्राप्त होता है और संतोषी होने से तृष्णा पर विजय मिलती है। पुरुषार्थ के माध्यम से आलस्य और निश्चय के माध्यम से आधारहीन आशंकाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
नदियों से निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा
इससे पहले 21 अगस्त को भी प्रधानमंत्री ने सुभाषित साझा किया था। उन्होंने लिखा था, “नदियों का अविरल प्रवाह सिखाता है कि हम किस प्रकार अपने सामर्थ्य का उपयोग मानवता की भलाई के लिए कर सकते हैं। निःस्वार्थ सेवा, समर्पण और परोपकार की यही भावना राष्ट्र को नई दिशा देती है।”
मानव जीवन की सार्थकता का संदेश
पीएम नरेंद्र मोदी ने संस्कृत श्लोक, “जीवनं स्वं परार्थाय नित्यं यच्छत मानवाः। इति सन्देशमाख्यातुं समुद्रं यान्ति निम्नगाः॥” साझा किया था। इसका भावार्थ है कि मनुष्यों को अपना जीवन सदैव दूसरों की सेवा और कल्याण के लिए समर्पित करना चाहिए। जिस प्रकार नदियां बिना किसी स्वार्थ के निरंतर बहते हुए अपने जल से असंख्य प्राणियों का जीवन पोषित करती हैं और अंततः समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन और सामर्थ्य का उपयोग दूसरों के हित में करना चाहिए। निःस्वार्थ सेवा, परोपकार और लोककल्याण में ही मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता है।
