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अकादमी और उद्योग के सहयोग से किए गए एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पहली बार विस्तार से पता लगाया है कि प्रिजर्वेटिव बैक्टीरिया को किस तरह निष्क्रिय करते हैं और उत्पादों को खराब होने से बचाने में कैसे मदद करते हैं। उन्नत इमेजिंग और रासायनिक विश्लेषण के जरिए शोधकर्ताओं ने दिखाया कि प्रिजर्वेटिव जीवाणु कोशिकाओं को बाहर और भीतर, दोनों स्तरों पर प्रभावित करते हैं। यह खोज घरेलू और व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों के लिए अधिक स्मार्ट और सुरक्षित प्रिजर्वेशन तकनीक विकसित करने में मदद कर सकती है।
सोडियम बेंजोएट और फेनोक्सीएथेनॉल का व्यापक इस्तेमाल
सोडियम बेंजोएट (एसबी) और फेनोक्सीएथेनॉल (पीओई) दोनों प्रभावी प्रिजर्वेटिव हैं। सोडियम बेंजोएट का इस्तेमाल 1900 के दशक की शुरुआत से अचार, केचप और कार्बोनेटेड पेय जैसे खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता रहा है। वहीं, फेनोक्सीएथेनॉल का उपयोग दशकों से शैंपू, मॉइस्चराइजर, सनस्क्रीन और कुछ टीकों में भी किया जा रहा है। हालांकि इन दोनों प्रिजर्वेटिव का लंबे समय से व्यापक इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन उनकी जीवाणुरोधी गतिविधि के पीछे मौजूद आणविक तंत्र को अब तक पूरी तरह समझा नहीं गया था।
आईएनएसटी और यूनिलीवर आर एंड डी ने मिलकर किया अध्ययन
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी), मोहाली के शोधकर्ताओं ने यूनिलीवर आर एंड डी, बैंगलोर के सहयोग से इस कमी को दूर करने का प्रयास किया। टीम ने ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (टीईएम) को विभिन्न जैव रासायनिक विश्लेषणों के साथ जोड़ा। अध्ययन में दो प्रतिनिधि जीवाणु रोगजनकों—ग्राम-पॉजिटिव स्टैफिलोकोकस ऑरियस और ग्राम-नेगेटिव स्यूडोमोनास एरुगिनोसा—पर प्रिजर्वेटिव के प्रभावों का अध्ययन किया गया।
बैक्टीरिया पर बहु-स्तरीय हमला
शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रिजर्वेटिव बैक्टीरिया पर केवल एक स्तर पर असर नहीं डालते, बल्कि कई मोर्चों पर एक साथ हमला करते हैं। माइक्रोबियल सेल लिफाफा भौतिक रूप से क्षतिग्रस्त होता है, जबकि प्रतिक्रियाशील एल्डिहाइड और ऑक्सीजन-व्युत्पन्न प्रजातियां कोशिका के भीतर जमा हो सकती हैं। इससे आवश्यक प्रोटीन, आनुवंशिक सामग्री और अन्य महत्वपूर्ण कोशिकीय प्रक्रियाएं बाधित होती हैं। इस तरह प्रिजर्वेटिव का प्रभाव एकल तंत्र के बजाय बहु-लक्ष्य प्रक्रिया के रूप में सामने आया।
दोनों प्रिजर्वेटिव का असर अलग-अलग
उन्नत इमेजिंग से पता चला कि सोडियम बेंजोएट और फेनोक्सीएथेनॉल बैक्टीरिया को निष्क्रिय करने के लिए अलग-अलग रास्तों का इस्तेमाल करते हैं। सोडियम बेंजोएट से कोशिकाओं में संकोचन और संरचनात्मक पतन देखा गया, जबकि फेनोक्सीएथेनॉल ने झिल्ली के विस्तार और अंततः उसके टूटने का कारण बनाया।
पीएच के साथ बदलती है प्रभावकारिता
अध्ययन में दोनों प्रिजर्वेटिव की प्रभावकारिता पर पीएच के प्रभाव को भी देखा गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि अम्लीय वातावरण में सोडियम बेंजोएट की क्षमता काफी बढ़ जाती है और इसकी गतिविधि में लगभग 16 गुना तक वृद्धि देखी गई। इसके विपरीत, फेनोक्सीएथेनॉल ने व्यापक पीएच रेंज में अपेक्षाकृत लगातार प्रभावकारिता दिखाई। इससे अलग-अलग फॉर्मूलेशन में प्रिजर्वेटिव के चयन और उपयोग को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।
कई तकनीकों से जुटाए गए प्रमाण
ईशानी शर्मा, एसएम रोज, मधु लता, सोमनाथ दास, नागराज आईएस आचार्य, महेश्वर नाइक, समीरन महापात्रा और शर्मिष्ठा सिन्हा की टीम ने निषेध क्षेत्र और न्यूनतम अवरोधक सांद्रता (एमआईसी) जैसे परीक्षणों के साथ इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी का इस्तेमाल किया। डाई-लीकेज परीक्षण से झिल्ली के रिसाव का अध्ययन किया गया, जबकि एमबीटीएच और डीसीएफडीए आधारित जैव रासायनिक परखों के जरिए कोशिका के भीतर होने वाले रासायनिक बदलावों को समझने का प्रयास किया गया। अलग-अलग बैक्टीरिया और तटस्थ तथा अम्लीय परिस्थितियों में किए गए परीक्षणों ने बाहरी संरचनात्मक बदलावों को कोशिका के भीतर होने वाली प्रक्रियाओं से जोड़ने में मदद की।
प्रिजर्वेटिव के बेहतर चयन में मिलेगी मदद
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इन तंत्रों की बेहतर समझ से उद्योग को किसी विशेष उत्पाद के फॉर्मूलेशन के लिए उपयुक्त प्रिजर्वेटिव चुनने में मदद मिल सकती है। अध्ययन के निष्कर्ष संकेत देते हैं कि अम्लीय उत्पादों में सोडियम बेंजोएट की उपयोगिता अधिक हो सकती है, जबकि व्यापक पीएच परिस्थितियों में स्थिर प्रभावकारिता की जरूरत वाले फॉर्मूलेशन में फेनोक्सीएथेनॉल उपयोगी हो सकता है। इससे प्रिजर्वेटिव की मात्रा को अधिक सटीक तरीके से तय करने, उत्पादों के खराब होने और उससे जुड़े कचरे को कम करने तथा भविष्य में सूक्ष्मजीवों से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर रणनीतियां विकसित करने में मदद मिल सकती है।
लेटर्स इन एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुआ अध्ययन
यह अध्ययन जर्नल लेटर्स इन एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि प्रिजर्वेटिव की कार्रवाई के पीछे मौजूद जैविक और रासायनिक प्रक्रियाओं की यह समझ भविष्य में अधिक प्रभावी प्रिजर्वेशन प्रणालियों के विकास का आधार बन सकती है।
