भोपाल, 05 अक्टूबर। मध्य प्रदेश में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयाेग ने स्कूलाें में पढ़ने वाली बालिकाओं के लिए विद्यालय में सुरक्षित, स्वच्छ और गरिमापूर्ण वातावरण सुलभ कराने के इरादे से राज्य के सरकारी और अशासकीय विद्यालयों में बालिकाओं के लिए शौचालय, पानी, सुरक्षा, सेनेटरी पैड से लेकर गोपनीय शिकायत तंत्र तक सभी जरूरी सुविधाओं के आकलन और उनकी निगरानी का एक व्यापक ढांचा तैयार करने की पहल की है।
आयोग अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा ने मध्य प्रदेश शासन के स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र भेजकर ‘बालिका गरिमा सूचकांक’ (गर्ल डिग्निटी इंडेक्स) विकसित करने और उसके आधार पर विद्यालयों की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कहा है। इस सूचकांक के आधार पर विद्यालयाें काे ‘ग्रीन’, ‘येलो’ या रेड की श्रेणी प्रदान की जाएगी।
उल्लेखनीय है कि आयोग की इस पहल को सामान्य प्रशासनिक निरीक्षण से आगे जाकर बालिकाओं के शिक्षा-अधिकार, स्वास्थ्य, सुरक्षा, निजता और गरिमा को विद्यालय व्यवस्था के केंद्र में रखने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया है कि बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 17 के तहत आयोग को बाल अधिकारों के संरक्षण, संवर्धन और निगरानी के लिए वैधानिक दायित्व प्राप्त हैं। इसी के तहत विद्यालयों में बालिकाओं की वास्तविक स्थिति का परीक्षण करते हुए आयोग ने अनेक ठोस सुझाव सरकार के समक्ष रखे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को विद्यालयों की व्यवस्था से जोड़ने की पहल
आयोग ने अपने पत्र में उच्चतम न्यायालय के डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार एवं अन्य, रिट याचिका (सिविल) का हवाला देते हुए कहा गया है कि विद्यालयों में छात्राओं के लिए कार्यशील शौचालय, सुरक्षित स्वच्छता व्यवस्था तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। आयोग ने इसी न्यायिक दृष्टिकोण को आधार बनाते हुए राज्यों और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की निगरानी एवं अनुपालन सुनिश्चित करने की भूमिका को रेखांकित किया है।
यानी विद्यालय में बालिका के लिए शौचालय उपलब्ध है या नहीं, पानी की व्यवस्था कैसी है, उसकी निजता और सुरक्षा सुनिश्चित है या नहीं, सेनेटरी पैड उपलब्ध हैं या नहीं, कचरे के निस्तारण की व्यवस्था है या नहीं, इन प्रश्नों को अब महज सुविधाओं की सूची के रूप में देखने के बजाय बालिका की गरिमा से जोड़कर देखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
हर स्कूल का बनेगा ‘बालिका गरिमा सूचकांक’
आयोग ने राज्य के सभी शासकीय एवं अशासकीय विद्यालयों के लिए ‘बालिका गरिमा सूचकांक’ विकसित करने के लिए कहा है। इसके तहत विद्यालयों का मूल्यांकन अनेक बिंदुओं पर किया जाएगा। इनमें कार्यशील बालिका शौचालय, जल उपलब्धता, गोपनीयता एवं सुरक्षा, सेनेटरी पैड की उपलब्धता, अपशिष्ट निस्तारण व्यवस्था, महिला शिक्षिकाओं की उपलब्धता, किशोरी उपस्थिति प्रतिशत और शिकायत निवारण तंत्र जैसे मानक शामिल हैं।
इस व्यवस्था का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इससे विद्यालयों की स्थिति को एक समान मानकों पर परखा जा सकेगा। आयोग ने सूचकांक के आधार पर विद्यालयों को ‘ग्रीन स्कूल’, ‘येलो स्कूल’ और ‘रेड स्कूल’ श्रेणियों में वर्गीकृत करने का प्रस्ताव दिया है। इससे प्रशासन को यह पहचानने में आसानी होगी कि किन विद्यालयों में व्यवस्था संतोषजनक है और किन संस्थानों में तत्काल सुधार की जरूरत है।
शौचालय नहीं तो निरीक्षण रिपोर्ट भी अधूरी
आयोग की सिफारिशों में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि जिस विद्यालय में बालिकाओं के लिए कार्यशील शौचालय उपलब्ध नहीं है, उसे शिक्षा की दृष्टि से ‘पूर्ण’ नहीं माना जाए तथा निरीक्षण एप में उसका जियो-टैग्ड फोटो अपलोड करना अनिवार्य किया जाए। इससे कागजी दावों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर को कम करने में मदद मिलेगी। विद्यालयों के शौचालयों की निगरानी के लिए क्यूआर कोड आधारित लाइव मॉनिटरिंग प्रणाली विकसित करने का सुझाव भी दिया गया है। इसके साथ प्रत्येक विद्यालय में बालिकाओं के लिए गोपनीय फीडबैक एवं शिकायत तंत्र विकसित करने की बात कही गई है, ताकि छात्राएं अपनी समस्याएं सुरक्षित तरीके से सामने रख सकें।
‘गरिमा कक्ष’ से लेकर नियमित ऑडिट तक
बड़े विद्यालयों में ‘गरिमा कक्ष’ स्थापित करने के लिए आयोग ने कहा है। इसके अलावा प्रत्येक जिले में नोडल अधिकारी नामित कर नियमित समीक्षा और अनुपालन प्रतिवेदन आयोग को उपलब्ध कराने की व्यवस्था प्रस्तावित है। राज्य स्तर पर ‘स्कूल टॉयलेट ऑडिट डे’ आयोजित कर सामाजिक सहभागिता आधारित निरीक्षण व्यवस्था विकसित करने का सुझाव भी इस पहल को व्यापक बनाता है। इसका उद्देश्य विद्यालयों में उपलब्ध सुविधाओं का वास्तविक और नियमित आकलन करना है।
बालिका की गरिमा को बनाया प्रशासनिक जवाबदेही का विषय
आयोग अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा का कहना है, इस पहल का मूल संदेश स्पष्ट है कि बालिका की शिक्षा में सुरक्षित शौचालय, स्वच्छ पानी, निजता, मासिक धर्म स्वच्छता, सुरक्षा और शिकायत सुनने की व्यवस्था बहुत आवश्यक है, यह बालिकाओं के विद्यालयी जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं हैं, जोकि उन्हें हर हाल में मिलना ही चाहिए।
उन्होंने कहा, मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस पूरे विषय को एक मापनीय सूचकांक से जोड़ने का जो प्रस्ताव रखा है, वह विद्यालयी व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो प्रत्येक विद्यालय की स्थिति आंकड़ों और प्रमाणों के आधार पर सामने आएगी तथा बालिकाओं की गरिमा से जुड़े मुद्दे प्रशासनिक प्राथमिकता में ऊपर आएंगे। हमारा दृष्टिकोण यही है कि बाल अधिकार संरक्षण महज शिकायत सुनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह विद्यालय व्यवस्था के भीतर सुरक्षा, सम्मान और गरिमा की स्थायी संस्कृति बनाने का माध्यम बने।
