चीन के चोंगकिंग के पास वैज्ञानिकों को एक विशाल शाकाहारी डायनासोर के अवशेष मिले हैं। इस नई प्रजाति का नाम मेमेन्चिसॉरस सानजियांगेंसिस रखा गया है। यह डायनासोर लेट जुरासिक काल में रहता था, जब लंबी गर्दन और भारी शरीर वाले सॉरोपॉड डायनासोर धरती पर छाए हुए थे। यह खोज पूर्वी एशिया के प्राचीन पर्यावरण और डायनासोर विविधता को समझने में अहम मानी जा रही है।
इस रिसर्च का नेतृत्व दक्षिण-पश्चिम चीन के इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोन्टोलॉजी के वैज्ञानिक हुई दाई ने किया। उनकी टीम ने चोंगकिंग के पास अपर शाक्सिमियाओ फॉर्मेशन में डायनासोर की गर्दन, पीठ, कूल्हों, पूंछ और पिछले पैर की हड्डियां खोजीं। ये अवशेष एक उथली झील के पास मिट्टी में दबे हुए थे, जिससे पता चलता है कि यह इलाका करीब 160 मिलियन साल पुराना है।
मिली हुई हड्डियों की तुलना पहले खोजे गए मेमेन्चिसॉरस डायनासोर से की गई। इसके आधार पर वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानवर आकार में बेहद विशाल रहा होगा—कई फीट लंबा और कई टन वजनी। यह डायनासोर अपने लंबे शरीर और अत्यंत लंबी गर्दन के लिए जाना जाता है। इसके नाम का अंतिम हिस्सा सानजियांगेंसिस उस स्थान को दर्शाता है जहां इसके अवशेष मिले—चोंगकिंग के हेचुआन जिले का वह क्षेत्र जहां तीन नदियां मिलती हैं।
चट्टानों की बनावट और भूगर्भीय परतों से साफ होता है कि यह क्षेत्र मिडिल से लेट जुरासिक काल का है। हड्डियों की संरचना के आधार पर वैज्ञानिकों ने इसे मेमेन्चिसॉरिडे परिवार का सदस्य माना है। इसके कूल्हों में पांच आपस में जुड़ी कशेरुकाएं थीं, जो इसके भारी शरीर को सहारा देती थीं। गर्दन और पीठ की हड्डियों में छोटे-छोटे खोखले स्थान पाए गए, जिससे वे हल्की होने के साथ-साथ मजबूत भी थीं।
इसके पिछले पैरों की फीमर हड्डी चौड़ी और मजबूत थी, जो इसके शक्तिशाली पैरों की ओर इशारा करती है। वहीं, पूंछ के अगले हिस्से में मांसपेशियों के मजबूत जुड़ाव मिले हैं, जिससे संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती होगी।
मेमेन्चिसॉरस सॉरोपॉड समूह का हिस्सा था—ये विशाल, लंबी गर्दन वाले शाकाहारी डायनासोर होते हैं। इसी परिवार की एक प्रजाति की गर्दन लगभग 15 मीटर लंबी मापी गई थी, जिसे अब तक की सबसे लंबी डायनासोर गर्दन माना जाता है। नई खोजी गई प्रजाति भी इसी असाधारण समूह से जुड़ी हुई है।
पहले माना जाता था कि जुरासिक काल में पूर्वी एशिया बाकी दुनिया से अलग-थलग था। लेकिन चीन और अफ्रीका में हो रही नई खोजों से संकेत मिलता है कि कई डायनासोर प्रजातियां अलग-अलग महाद्वीपों में फैली हुई थीं। इससे पता चलता है कि उस समय डायनासोर पूरी दुनिया में घूमते थे।
हड्डियों को बैंगनी-लाल मिट्टी से सावधानीपूर्वक निकाला गया। वैज्ञानिकों ने हर हड्डी की स्थिति दर्ज की और फिर उन्हें प्लास्टर से ढककर सुरक्षित किया। फिलहाल यह खोज एक अधूरे कंकाल पर आधारित है, इसलिए इसके पूरे आकार और जीवनशैली को समझने के लिए आगे और रिसर्च की ज़रूरत है। यह अध्ययन एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
