Meta की नई प्राइवेसी पॉलिसी सामने आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हलचल तेज़ हो गई है। Facebook, Instagram, WhatsApp और Threads इस्तेमाल करने वाले यूज़र्स को अब यह चिंता सताने लगी है कि कंपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के ज़रिये उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर पहले से कहीं ज़्यादा नज़र रखेगी। Meta का दावा है कि इससे यूज़र्स को उनकी पसंद के विज्ञापन दिखाए जा सकेंगे, लेकिन प्राइवेसी एक्सपर्ट्स इसे निजता के लिए खतरा मान रहे हैं।
AI पर टिका Meta का पूरा विज्ञापन कारोबार
यह बदलाव मामूली नहीं है। Meta अपने पूरे ऐड बिज़नेस को अब AI के सहारे चलाने की तैयारी में है। इसका मतलब है कि कंपनी अपने सभी प्लेटफॉर्म्स पर यूज़र डेटा का पहले से कहीं ज़्यादा गहराई से इस्तेमाल करेगी, ताकि विज्ञापन और अधिक सटीक और टारगेटेड बनाए जा सकें।
आपकी हर ऑनलाइन एक्टिविटी बनेगी डेटा
नई पॉलिसी के मुताबिक, Meta का AI यह ट्रैक कर सकता है कि आप क्या लाइक करते हैं, क्या सर्च करते हैं, किन पोस्ट्स पर ज़्यादा समय बिताते हैं और AI असिस्टेंट से किस तरह की बातचीत करते हैं। सिर्फ मैसेज ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ा मेटाडेटा—जैसे टॉपिक, कीवर्ड या वॉयस चैट से जुड़ी जानकारी—भी एल्गोरिदम तक पहुंच सकती है।
Meta का कहना है कि वह प्राइवेट मैसेज इंसानों की तरह “पढ़ता” नहीं है, लेकिन इन्हीं डेटा पॉइंट्स के आधार पर विज्ञापन दिखाने की प्रक्रिया ने प्राइवेसी को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
Facebook, Instagram और WhatsApp में शामिल हुआ Meta AI
अब Meta AI सीधे Facebook, Instagram और WhatsApp का हिस्सा बन चुका है। अगर कोई यूज़र AI से ट्रैकिंग, फिटनेस या ट्रैवल से जुड़ा सवाल पूछता है, तो कुछ ही समय बाद उसी विषय से जुड़े विज्ञापन उसके फीड में दिखने लगते हैं। कंपनी का कहना है कि इससे गैर-ज़रूरी विज्ञापनों की जगह यूज़र्स को उनकी रुचि के ऐड देखने को मिलेंगे।
कैसे काम करता है यह सिस्टम
यूज़र जैसे ही Meta AI से बातचीत करता है, सिस्टम उसमें मौजूद कीवर्ड्स और पैटर्न के आधार पर उसकी रुचियों का प्रोफाइल तैयार करता है। यही प्रोफाइल बाद में Facebook, Instagram और अन्य Meta ऐप्स पर विज्ञापनों के रूप में सामने आती है। कई बार ऑफर्स से जुड़े नोटिफिकेशन या ईमेल भी भेजे जा सकते हैं।
क्यों हो रहा है इतना विरोध
Meta की इस रणनीति को लेकर विरोध भी तेज़ हो गया है। उपभोक्ता अधिकार, प्राइवेसी और सिविल राइट्स से जुड़े 36 संगठनों ने अमेरिका की Federal Trade Commission (FTC) में शिकायत दर्ज कराई है। उनका कहना है कि यूज़र्स की बातचीत के आधार पर विज्ञापन दिखाना निजता की सीमा को पार करता है और सहमति व डेटा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
Meta का बचाव और आगे की तस्वीर
Meta का दावा है कि उसने अक्टूबर 2025 में ही इन बदलावों के संकेत दे दिए थे और कंपनी को पूरा भरोसा है कि AI आधारित विज्ञापन यूज़र्स के लिए ज़्यादा उपयोगी साबित होंगे। साथ ही Meta यह भी कह रहा है कि यूज़र्स का व्यक्तिगत डेटा सुरक्षित है।
आम यूज़र के लिए इसका क्या मतलब
अब Meta ऐप्स पर दिखने वाला कंटेंट और विज्ञापन पहले से कहीं ज़्यादा AI-ड्रिवन होगा। भले ही फीड ज़्यादा “रिलेटेबल” लगे, लेकिन यह सवाल बना रहेगा कि यूज़र का डेटा कैसे और किस हद तक इस्तेमाल किया जा रहा है। पारदर्शिता और सहमति को लेकर उठी चिंताएं फिलहाल थमती नज़र नहीं आ रहीं।
