‘सावन माह में विशेष’ की कड़ी में हम आपको सावन (श्रावण) के प्रारंभ से ही भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। इससे पहले, आपने प्रथम सोमनाथ, दूसरे मल्लिकार्जुन, तीसरे महाकालेश्वर, चौथे ओंकारेश्वर, पांचवें केदारेश्वर और छठें भीमाशंकर, सातवें विश्वेश्वर, आठवें त्र्यंबकेश्वर, नवें बैद्यनाथ, दसवें नागेश्वर, ग्यारहवें रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के बारे पढ़ा। आज सावन के अंतिम सोमवार को आप इस आखिरी कड़ी में ‘घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग’ (या घुश्मेश्वर) के बारे में जानेंगे।
‘घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग’ महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास वेरुल (जिन्हें एलोरा भी कहते हैं) के शांत गांव में घृष्णेश्वर मंदिर स्थित है। यह आस्था और इतिहास का एक अद्भुत नमूना है। यह पवित्र मंदिर भगवान शिव का 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग है। मान्यता है कि घृष्णेश्वर में आकर शिव के इस स्वरूप के दर्शन से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती हैं।
इसकी शक्तिशाली ऊर्जा से खिंचे चले आए तीर्थयात्री दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं। लयबद्ध मंत्रोच्चारण और घंटियों की गूंज हवा को एक रहस्यमयी माहौल से भर देती है। इसकी प्राचीन दीवारों में किंवदंतियां गूंजती हैं, जो अटूट निष्ठा की कहानियां सुनाती हैं।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्री शैले मल्लिकार्जुनम | उज्जयिन्यां महाकालंओंकारं ममलेश्वरम || केदारं हिमवत्प्रष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम | वाराणस्यां च विश्वेशं त्रयम्बकं गोतमी तटे || वैधनाथं चितभूमौ नागेशं दारुकावने | सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं तु शिवालये || ये श्लोक शिव पुराण की कोटि रुद्र संहिता, अध्याय 1, श्लोक 32-33 में है। इसमें भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के नाम और उनके स्थान बताए गए हैं।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (या घुश्मेश्वर) के विषय में पुराणों में एक कथा वर्णित है। दक्षिण देश में देवगिरिपर्वत के निकट सुधर्मा नामक एक अत्यंत तेजस्वी तपोनिष्ट ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था। दोनों में परस्पर बहुत प्रेम था। किसी प्रकार का कोई कष्ट उन्हें नहीं था। लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। ज्योतिष-गणना से पता चला कि सुदेहा के गर्भ से संतानोत्पत्ति हो ही नहीं सकती। सुदेहा संतान की बहुत ही इच्छुक थी। उसने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन से दूसरा विवाह करने का आग्रह किया। पहले तो सुधर्मा को यह बात नहीं जंची। लेकिन अंत में उन्हें पत्नी की जिद के आगे झुकना ही पड़ा। वे उसका आग्रह टाल नहीं पाए। वे अपनी पत्नी की छोटी बहन घुश्मा को ब्याह कर घर ले आए। घुश्मा अत्यंत विनीत और सदाचारिणी स्त्री थी। वह भगवान् शिव की अनन्य भक्ता थी। प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर हृदय की सच्ची निष्ठा के साथ उनका पूजन करती थी।
भगवान शिवजी की कृपा से थोड़े ही दिन बाद उसके गर्भ से अत्यंत सुंदर और स्वस्थ बालक का जन्म हुआ। बच्चे के जन्म से सुदेहा और घुश्मा दोनों के ही आनंद का पार न रहा। दोनों के दिन बड़े आराम से बीत रहे थे। लेकिन न जाने कैसे थोड़े ही दिनों बाद सुदेहा के मन में एक कुविचार ने जन्म ले लिया। वह सोचने लगी, मेरा तो इस घर में कुछ है नहीं। सब कुछ घुश्मा का है। अब तक सुदेहा के मन में कुविचार-रूपी अंकुर एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था। उसने सोचा, मेरे पति पर भी उसने अधिकार जमा लिया। संतान भी उसी की है…धीरे-धीरे यह कुविचार उसके मन में बढ़ने लगा। इधर घुश्मा का वह बालक भी बड़ा हो रहा था। वह जवान हो गया और उसका विवाह भी हो गया।
ईर्ष्या की अग्नि में जलती हुई सुदेहा ने अंततः एक दिन, घुश्मा के युवा पुत्र को रात में सोते समय मार डाला। उसके शव को ले जाकर उसने उसी तालाब में फेंक दिया जिसमें घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंगों को विसर्जित करती थी। सुबह होते ही सबको इस बात का पता लगने पर पूरे घर में कोहराम मच गया। सुधर्मा और उसकी पुत्रवधू दोनों सिर पीटकर फूट-फूटकर रोने लगे। लेकिन घुश्मा नित्य की भांति भगवान् शिव की आराधना में तल्लीन रही, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पूजा समाप्त करने के बाद वह पार्थिव शिवलिंगों को तालाब में छोड़ने के लिए चल पड़ी। जब वह तालाब से लौटने लगी, उसी समय उसका प्यारा लाल तालाब के भीतर से निकलकर आता हुआ दिखाई पड़ा। वह सदा की भांति आकर घुश्मा के चरणों पर गिर पड़ा। जैसे कहीं आस-पास से ही घूमकर आ रहा हो।
इसी समय भगवान शिव भी वहां प्रकट होकर घुश्मा से वर मांगने को कहने लगे। वह सुदेहा की घनौनी करतूत से अत्यंत क्रुद्ध हो उठे थे। अपने त्रिशूल द्वारा उसका गला काटने को उद्यत दिखाई दे रहे थे। घुश्मा ने हाथ जोड़कर भगवान् शिव से कहा- ‘प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरी उस अभागिन बहन को क्षमा कर दें। निश्चित ही उसने अत्यंत जघन्य पाप किया है। आपकी दया से मुझे मेरा पुत्र वापस मिल गया। अब आप उसे क्षमा करें, प्रभु! मेरी एक प्रार्थना और है, लोक-कल्याण के लिए आप इस स्थान पर हमेशा के लिए निवास करें।’ भगवान् शिव ने उसकी ये दोनों बातें स्वीकार कर लीं। ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर वह वहीं निवास करने लगा। सती शिवभक्त घुश्मा के आराध्य होने के कारण वे यहां घुश्मेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुए। घुश्मेश्वर-ज्योतिर्लिंग की महिमा पुराणों में बहुत विस्तार से वर्णित की गई है। इनका दर्शन लोक-परलोक दोनों के लिए अमोघ फलदायी है।
घृष्णेश्वर मंदिर
घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है और इसका ज़िक्र शिव पुराण और स्कंद पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में मिलता है। इतिहास के दौरान इस मंदिर को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसमें दिल्ली सल्तनत के समय 13वीं और 14वीं सदी में हुई तबाही भी शामिल है। इसे कई बार फिर से बनाया गया, खासकर 16वीं सदी में महान मराठा योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी भोसले द्वारा। मंदिर की मौजूदा भव्यता काफ़ी हद तक इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा 18वीं सदी में किए गए जीर्णोद्धार के प्रयासों की देन है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका संरक्षण सुनिश्चित हो सका।
इस मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय धरोहर स्थल के तौर पर भी शामिल किया है। यह तीर्थ UNESCO की विश्व धरोहर स्थल ‘एलोरा गुफाओं’ से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर है। घृष्णेश्वर मंदिर हिंदू धर्म की शैव परंपरा में एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। मंदिर 44,000 वर्ग फुट के इलाके में खूबसूरत लाल पत्थर से बना है। यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला शैली में बना है, जो महाराष्ट्र में कम ही देखने को मिलती है। आकर्षक लाल ज्वालामुखी चट्टानों से बना घृष्णेश्वर मंदिर हेमाडपंथी वास्तुकला शैली का बेहतरीन उदाहरण है, जो अपनी बारीक नक्काशी और मज़बूत बनावट के लिए जानी जाती है। इसके गर्भगृह में पवित्र शिवलिंग स्थापित है। प्रवेश द्वार पर नंदी की मूर्ति है, जो भगवान शिव का पवित्र बैल है। दीवारों और खंभों पर भगवान शिव, देवी पार्वती और अन्य देवी-देवताओं की नक्काशी की गई है।
पूजा और कार्यक्रम
घृष्णेश्वर मंदिर न केवल वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है, बल्कि आध्यात्मिक गतिविधियों का एक जीवंत केंद्र भी है। भक्त आशीर्वाद और आध्यात्मिक शांति पाने के लिए जल अभिषेक, पंचामृत अभिषेक, रूद्र अभिषेक, महापूजा, लघु रुद्र (11 ब्राह्मण सहित),लघु रुद्र (11 ब्राह्मण और भोजन सहित), महारुद्र, रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय जाप जैसी विभिन्न पूजा-पद्धतियों में शामिल होते हैं। यहां एक अनोखी परंपरा का पालन किया जाता है, जिसके तहत पुरुष भक्तों को विनम्रता और सम्मान के प्रतीक के तौर पर बिना शर्ट पहने गर्भगृह में प्रवेश करना होता है। रोज़ाना होने वाली आरती के दौरान मंदिर मंत्रों और भजनों से गूंज उठता है, जिससे गहरी भक्ति का माहौल बन जाता है। घृष्णेश्वर मंदिर में मनाए जाने वाले सबसे खास त्योहारों में से एक महाशिवरात्रि है, जो भगवान शिव और देवी पार्वती के दिव्य विवाह का उत्सव है। यह त्योहार देश भर से तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है और मंदिर को आध्यात्मिक उत्साह और सांस्कृतिक उत्सवों का केंद्र बना देता है।
यह मंदिर अतीत और वर्तमान के बीच एक पुल और भारत की आध्यात्मिक आत्मा का प्रतीक है। यह केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि आस्था और अटूट संकल्प की एक जीवंत गाथा है। यहां आने वाले लोग शांति का अनुभव करते हैं और मंदिर की दिव्य उपस्थिति उनके दिलों को छू लेती है। हर साल यहां सावन माह के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
