29 अगस्त भारत के खेल इतिहास में खास महत्व रखता है। इसी दिन महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद का जन्म हुआ था। उनके योगदान को सम्मान देने के लिए हर वर्ष इस दिन राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। यह अवसर भारत की खेल यात्रा, उपलब्धियों और भविष्य की चुनौतियों पर विचार करने का भी मौका देता है। मेजर ध्यानचंद ने सीमित संसाधनों वाले दौर में अपनी प्रतिभा, अनुशासन और निरंतर अभ्यास के दम पर भारतीय हॉकी को दुनिया में पहचान दिलाई। उनका जीवन बताता है कि सफलता के लिए संसाधनों के साथ मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प भी जरूरी हैं। आज भारतीय खेलों का दायरा काफी बढ़ा है। क्रिकेट के अलावा हॉकी, बैडमिंटन, कुश्ती, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, एथलेटिक्स, भारोत्तोलन और तीरंदाजी में भी भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं। नीरज चोपड़ा, पीवी सिंधु, मनु भाकर और मीराबाई चानू जैसे खिलाड़ियों की उपलब्धियों ने युवाओं को प्रेरित किया है।
फिर भी बड़ी चुनौती देश की जमीनी प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें निखारने की है। गांवों, कस्बों और छोटे शहरों के बच्चों को बेहतर प्रशिक्षण, सुविधाएं और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना जरूरी है। स्कूलों में खेल को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाने के साथ इसे सम्मानजनक करियर विकल्प के रूप में बढ़ावा देना होगा। महिला खिलाड़ियों की बढ़ती भागीदारी और खेल विज्ञान का बढ़ता महत्व सकारात्मक बदलाव के संकेत हैं। 2036 और 2047 के लक्ष्यों को देखते हुए भारत को ऐसी समावेशी खेल व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें सरकार, संस्थाएं और समाज मिलकर काम करें। राष्ट्रीय खेल दिवस की सार्थकता तभी होगी, जब खेल हर बच्चे और युवा के जीवन का हिस्सा बनें। यही मेजर ध्यानचंद को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
भारत में खेलों की यात्रा : हॉकी से बहुआयामी खेल संस्कृति तक
स्वतंत्रता से पहले भारतीय खेलों की पहचान मुख्य रूप से हॉकी से बनी। भारतीय टीम ने ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन कर विश्व मंच पर देश की मजबूत पहचान स्थापित की। आजादी के बाद भारत ने कई खेलों में कदम बढ़ाया, लेकिन लंबे समय तक अन्य खेलों के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हो सका। इसी दौरान क्रिकेट देश का सबसे लोकप्रिय खेल बन गया। इसकी सफलता और खेल उद्योग के विस्तार से प्रायोजन व पेशेवर अवसर बढ़े, लेकिन अन्य खेल पीछे रह गए। पिछले दो दशकों में तस्वीर बदली है। बैडमिंटन, कुश्ती, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, एथलेटिक्स और तीरंदाजी में सफलता ने साबित किया है कि प्रतिभा की कमी नहीं, जरूरत उसे पहचानने और निखारने की है।
क्रिकेट से आगे बढ़ता भारत
भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता को नकारा नहीं जा सकता। क्रिकेट ने देश में खेल संस्कृति को लोकप्रिय बनाने, खिलाड़ियों के लिए रोजगार पैदा करने और खेल उद्योग को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन भारत की खेल पहचान अब केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं रह गई है। ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने नई पीढ़ी को कई नए खेलों से जोड़ा है। एथलेटिक्स में नीरज चोपड़ा की सफलता ने भाला फेंक जैसे खेल को घर-घर तक पहुंचाया। पीवी सिंधु ने बैडमिंटन को नई ऊंचाई दी। मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन को नई पहचान दी। महिला खिलाड़ियों की बढ़ती सफलता ने भी समाज में खेल को लेकर सोच बदलने में योगदान दिया है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी देश को खेल महाशक्ति बनने के लिए केवल एक लोकप्रिय खेल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। खेलों की विविधता ही मजबूत खेल व्यवस्था की पहचान होती है।
ओलंपिक : भारत की उपलब्धियों और चुनौतियों का आईना
ओलंपिक किसी भी देश की खेल व्यवस्था और उसकी तैयारियों की व्यापक तस्वीर पेश करते हैं। भारत ने ओलंपिक में कई यादगार उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन पदकों की संख्या और विभिन्न खेलों में भागीदारी बढ़ाने की दिशा में अभी लंबा सफर तय करना है। हॉकी का भारत की ओलंपिक यात्रा में ऐतिहासिक योगदान रहा है, जबकि निशानेबाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन और एथलेटिक्स में भी संभावनाएं बढ़ी हैं। भविष्य की चुनौती प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि उसे लंबे समय तक विश्वस्तरीय प्रशिक्षण और वैज्ञानिक सहयोग देने की है। खिलाड़ियों को प्रशिक्षक, फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञ, खेल मनोवैज्ञानिक, आधुनिक उपकरण और चोट से उबरने की बेहतर सुविधाएं जरूरी हैं।
खेलो इंडिया : प्रतिभा खोजने की नई कोशिश
भारत की खेल व्यवस्था में ‘खेलो इंडिया’ कार्यक्रम जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ाने की महत्वपूर्ण पहल है। लंबे समय तक गांवों, छोटे शहरों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के कई प्रतिभाशाली बच्चे संसाधनों के अभाव में आगे नहीं बढ़ सके। ‘खेलो इंडिया’ के जरिए स्कूल स्तर की प्रतियोगिताओं, प्रशिक्षण केंद्रों, खेल बुनियादी ढांचे और प्रतिभा पहचान की व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि किसी भी योजना की सफलता केवल बजट या घोषणा से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि कितने खिलाड़ियों को निरंतर प्रशिक्षण, बेहतर अवसर और करियर बनाने का रास्ता मिला।
फिट इंडिया : खेल को जन आंदोलन बनाने की जरूरत
खेलों की चर्चा केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। देश की बड़ी आबादी को स्वस्थ और सक्रिय बनाना भी खेल नीति का महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए। फिट इंडिया जैसी पहल का महत्व इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। आधुनिक जीवन शैली में शारीरिक गतिविधियां कम होती जा रही हैं। बच्चों और युवाओं का समय मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल मनोरंजन में अधिक बीत रहा है। ऐसे समय में खेल और शारीरिक गतिविधि को जीवन का नियमित हिस्सा बनाना जरूरी है। राष्ट्रीय खेल दिवस का संदेश इसलिए केवल यह नहीं होना चाहिए कि भारत कितने पदक जीतता है। इसका संदेश यह भी होना चाहिए कि कितने बच्चे रोज मैदान में उतरते हैं, कितने स्कूलों में खेल की सुविधा है और कितने परिवार खेल को बच्चे के विकास का आवश्यक हिस्सा मानते हैं।
स्कूलों से शुरू होगी असली खेल क्रांति
भारत में खेलों की मजबूत संस्कृति विकसित करनी है तो इसकी शुरुआत स्कूलों से करनी होगी। आज भी अनेक स्कूलों में खेल का समय पढ़ाई की तुलना में कम महत्व रखता है। कई स्थानों पर पर्याप्त मैदान नहीं हैं। कुछ स्कूलों में प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक और प्रशिक्षक भी उपलब्ध नहीं हैं। यह सोच बदलनी होगी। खेल को पढ़ाई का विरोधी नहीं, बल्कि शिक्षा का हिस्सा मानना होगा। नियमित खेल बच्चों में अनुशासन, नेतृत्व, टीम भावना, निर्णय क्षमता और आत्मविश्वास विकसित करता है। खेल में हार और जीत दोनों का अनुभव मिलता है। बच्चा सीखता है कि असफलता के बाद फिर प्रयास कैसे किया जाता है। यह जीवन कौशल किसी भी पाठ्यपुस्तक से कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि हर स्कूल में पर्याप्त खेल सुविधा, प्रशिक्षित कोच और नियमित प्रतियोगिता उपलब्ध हो तो भारत को बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली खिलाड़ी मिल सकते हैं।
गांव और छोटे शहरों में छिपी प्रतिभा
भारत की सबसे बड़ी खेल संभावनाएं महानगरों से बाहर भी मौजूद हैं। गांवों और छोटे शहरों में अनेक बच्चे प्राकृतिक रूप से मजबूत और प्रतिभाशाली होते हैं। कुश्ती, एथलेटिक्स, हॉकी, कबड्डी, भारोत्तोलन और अन्य खेलों में ग्रामीण भारत लंबे समय से प्रतिभा पैदा करता रहा है। लेकिन आर्थिक संसाधनों की कमी अक्सर इन खिलाड़ियों की सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। परिवार के पास प्रशिक्षण, यात्रा, उपकरण और पोषण पर खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं होता। कई बच्चे कम उम्र में काम या पढ़ाई की जिम्मेदारियों के कारण खेल छोड़ देते हैं। इसलिए भारत की खेल नीति में ग्रामीण और छोटे शहरों के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। स्थानीय स्तर पर खेल मैदान, छात्रावास, प्रशिक्षण केंद्र, पोषण सहायता और प्रतियोगिताओं की व्यवस्था प्रतिभा को आगे बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
महिला खिलाड़ियों का बदलता भारत
भारतीय खेलों की सबसे सकारात्मक कहानियों में महिला खिलाड़ियों का उभार शामिल है। एक समय था जब परिवारों में लड़कियों को खेलों में करियर बनाने के लिए बहुत कम प्रोत्साहन मिलता था। आज स्थिति बदल रही है। पीवी सिंधु, साक्षी मलिक, मीराबाई चानू, मनु भाकर और अनेक अन्य खिलाड़ियों ने यह साबित किया है कि भारतीय महिलाएं विश्व स्तर पर किसी भी खेल में सफलता हासिल कर सकती हैं। महिला खिलाड़ियों की सफलता का सामाजिक प्रभाव भी व्यापक है। इससे परिवारों की सोच बदलती है और छोटे शहरों तथा गांवों की लड़कियों को नए सपने देखने का साहस मिलता है। फिर भी महिला खिलाड़ियों के सामने कई चुनौतियां बनी हुई हैं। प्रशिक्षण सुविधाओं, सुरक्षित आवास, यात्रा, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर लगातार ध्यान देने की जरूरत है।
खेल विज्ञान : आधुनिक सफलता की कुंजी
आज के अंतरराष्ट्रीय खेलों में केवल प्रतिभा और मेहनत पर्याप्त नहीं है। बेहतर प्रदर्शन के लिए खेल विज्ञान की भूमिका लगातार बढ़ रही है। खेल चिकित्सा, पोषण, फिजियोथेरेपी, बायोमैकेनिक्स, प्रदर्शन विश्लेषण और मानसिक प्रशिक्षण खिलाड़ी की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। डेटा एनालिटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए खिलाड़ी की तकनीक, फिटनेस, चोट के जोखिम और प्रदर्शन में सुधार की संभावनाओं का बेहतर आकलन किया जा सकता है। आने वाले समय में खेलों में तकनीक का इस्तेमाल और बढ़ेगा। ऐसे में भारत को विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार करने के लिए खेल विज्ञान, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और तकनीकी संसाधनों में निवेश बढ़ाना होगा।
खेल और मानसिक स्वास्थ्य
खेलों में मानसिक मजबूती का महत्व भी तेजी से बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी लगातार दबाव में रहते हैं। उनसे हर प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा होती है। हार, चोट, चयन न होना, आलोचना और अपेक्षाओं का दबाव खिलाड़ी के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए आधुनिक खेल व्यवस्था में खेल मनोवैज्ञानिक की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। युवा खिलाड़ियों को यह समझाना भी जरूरी है कि हार असफलता का अंतिम प्रमाण नहीं है। हार से सीखकर वापसी करना खेल की सबसे बड़ी शिक्षा है।
डोपिंग : खेल की विश्वसनीयता के सामने चुनौती
खेलों में प्रदर्शन बढ़ाने के लिए प्रतिबंधित पदार्थों का इस्तेमाल विश्व स्तर पर गंभीर समस्या है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। डोपिंग से खिलाड़ी का करियर, देश की प्रतिष्ठा और खेल की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसलिए केवल खिलाड़ियों को दोष देने के बजाय उन्हें वैज्ञानिक और कानूनी जानकारी देना भी जरूरी है। खिलाड़ियों, कोचों और सहयोगी स्टाफ को नियमित रूप से डोपिंग नियमों की जानकारी दी जानी चाहिए। पोषण और सप्लीमेंट के इस्तेमाल में भी सावधानी जरूरी है।
खेल प्रशासन में पारदर्शिता
खेल की सफलता के लिए अच्छा प्रशासन उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अच्छा खिलाड़ी। खिलाड़ियों का चयन पारदर्शी हो, प्रशिक्षण के अवसर निष्पक्ष हों, संसाधनों का सही इस्तेमाल हो और खिलाड़ियों की शिकायतों को सुना जाए इन सभी पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है। खिलाड़ी को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी सफलता का निर्णय प्रदर्शन और योग्यता के आधार पर होगा। खेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही से खिलाड़ियों का विश्वास मजबूत होता है।
खेल अर्थव्यवस्था : नई संभावनाओं का क्षेत्र
भारत में खेल अब केवल मैदान तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक बड़ा आर्थिक तंत्र विकसित हो रहा है। स्पोर्ट्स लीग, प्रसारण, विज्ञापन, खेल उपकरण, फिटनेस सेंटर, खेल पर्यटन, डिजिटल मीडिया और खेल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। खेल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलने से खिलाड़ियों के अलावा कोच, फिजियोथेरेपिस्ट, फिटनेस ट्रेनर, डेटा विश्लेषक, स्पोर्ट्स पत्रकार, खेल प्रबंधक और अन्य पेशेवरों के लिए भी अवसर बढ़ते हैं। आने वाले वर्षों में भारत के लिए खेल को एक रोजगार और आर्थिक विकास के क्षेत्र के रूप में विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।
खेल को करियर के रूप में स्वीकार करने की जरूरत
भारत में अभी भी कई परिवार खेल को सुरक्षित करियर नहीं मानते। बच्चे को खिलाड़ी बनने की इच्छा होती है, लेकिन परिवार पढ़ाई और नौकरी को प्राथमिकता देता है। यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है। खिलाड़ियों को पुरस्कार, प्रायोजन, लीग, सरकारी नौकरियों और पेशेवर अनुबंधों से आर्थिक अवसर मिल रहे हैं। लेकिन खेल को वास्तविक करियर विकल्प बनाने के लिए केवल कुछ सफल खिलाड़ियों के उदाहरण पर्याप्त नहीं हैं। जरूरी है कि देश में खेल शिक्षा, प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति, रोजगार और सेवानिवृत्ति के बाद की सुरक्षा का पूरा तंत्र विकसित हो।
दिव्यांग खिलाड़ियों की उपलब्धियां
भारतीय खेल यात्रा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि पैरालंपिक खिलाड़ियों का उभार है। दिव्यांग खिलाड़ियों ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया है। उनकी सफलता समाज को यह संदेश देती है कि खेल केवल शारीरिक क्षमता का नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और अवसर का भी क्षेत्र है। दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए सुलभ खेल परिसर, आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित कोच और पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना समावेशी खेल व्यवस्था के लिए आवश्यक है।
खेल और सामाजिक बदलाव
खेल समाज को जोड़ने की शक्ति रखता है। मैदान पर खिलाड़ी की पहचान उसकी जाति, भाषा, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके प्रदर्शन से होती है। एक छोटे गांव से निकला खिलाड़ी जब राष्ट्रीय ध्वज के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़ा होता है तो वह पूरे देश की पहचान बन जाता है। खेल युवाओं को अनुशासन और सकारात्मक ऊर्जा देता है। ग्रामीण और संवेदनशील क्षेत्रों में खेल गतिविधियां युवाओं को नशे, हिंसा और असामाजिक गतिविधियों से दूर रखने में मदद कर सकती हैं। इसलिए खेल को सामाजिक विकास की नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए।
‘खेलो भारत नीति-2025’ और नई दिशा
भारत की खेल नीति में हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। खेलों को केवल पदक जीतने की गतिविधि के बजाय राष्ट्र निर्माण, स्वास्थ्य, सामाजिक समावेशन और आर्थिक विकास से जोड़ने पर जोर बढ़ा है। ‘खेलो भारत नीति-2025’ इसी व्यापक दृष्टिकोण को सामने रखती है। इसमें जमीनी स्तर से लेकर ओलंपिक पोडियम तक खेल व्यवस्था विकसित करने की सोच है। नीति में प्रतिभा पहचान, खेल बुनियादी ढांचा, खेल विज्ञान, खेल चिकित्सा, प्रशिक्षण, खिलाड़ियों की सहायता, खेल को करियर के रूप में बढ़ावा, खेल अर्थव्यवस्था और समावेशिता जैसे क्षेत्रों को महत्व दिया गया है। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी खिलाड़ी को ओलंपिक पदक के लिए तैयार करने की प्रक्रिया उसके अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहुंचने से कई वर्ष पहले शुरू होती है।
2036 का ओलंपिक और भारत की आकांक्षा
भारत ने 2036 ओलंपिक की मेजबानी की आकांक्षा व्यक्त की है। यदि भारत भविष्य में ओलंपिक की मेजबानी करता है तो यह देश के खेल इतिहास में बड़ा अवसर होगा। लेकिन ओलंपिक की मेजबानी केवल स्टेडियम बनाने का सवाल नहीं है। इसके लिए विश्वस्तरीय परिवहन, आवास, खेल परिसर, प्रशिक्षण केंद्र, स्वयंसेवक, सुरक्षा और आयोजन क्षमता के साथ मजबूत खेल संस्कृति की भी जरूरत होगी। मेजबानी की तैयारी भारत के खेल बुनियादी ढांचे को बड़े स्तर पर बदल सकती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह हो सकता है कि खेल सुविधाएं केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहकर देश के दूसरे हिस्सों तक भी पहुंचें।
2047 का भारत और खेल
भारत जब 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा, तब खेलों की भूमिका भी विकसित भारत की कहानी का हिस्सा होनी चाहिए। 2047 का भारत ऐसा हो सकता है जहां खेल केवल कुछ हजार पेशेवर खिलाड़ियों तक सीमित न हो। हर बच्चे को खेलने का अवसर मिले, हर जिले में बेहतर खेल सुविधा हो, गांवों में प्रतिभा पहचान की व्यवस्था हो और खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण उपलब्ध हो। भारत को केवल अधिक पदक जीतने वाला देश नहीं, बल्कि खेलों में व्यापक भागीदारी वाला देश बनना होगा।
आगे की राह : क्या करना होगा?
भारत को वैश्विक खेल शक्ति बनाने के लिए कई बुनियादी क्षेत्रों पर लगातार काम करना होगा। स्कूल स्तर पर खेलों को गंभीरता से बढ़ावा देने के साथ गांवों और छोटे शहरों में बेहतर खेल सुविधाएं विकसित करनी होंगी। प्रशिक्षित कोच और खेल वैज्ञानिकों की संख्या बढ़ानी होगी तथा महिला और दिव्यांग खिलाड़ियों को सुरक्षित और समान अवसर देने होंगे। खेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है। खिलाड़ियों को चोट, डोपिंग और मानसिक दबाव से निपटने के लिए बेहतर सहायता मिलनी चाहिए। खेल को शिक्षा और करियर से जोड़ने के साथ खेल विज्ञान और तकनीक में निवेश बढ़ाना होगा। लक्ष्य केवल पदक नहीं, बल्कि स्वस्थ और खेल-प्रेमी समाज बनाना होना चाहिए।
जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को पहचानने और तराशने की जरूरत
राष्ट्रीय खेल दिवस केवल मेजर ध्यानचंद की जयंती नहीं, बल्कि भारत की खेल यात्रा और भविष्य की दिशा पर विचार करने का अवसर है। आज देश के पास बेहतर संसाधन, आधुनिक तकनीक और मजबूत खेल ढांचा है। चुनौती अब प्रतिभाओं को पहचानने, उन्हें प्रशिक्षण देने और लगातार सहयोग उपलब्ध कराने की है। भारत को खेल शक्ति बनाने के लिए गांवों और छोटे शहरों की प्रतिभाओं को अवसर देना, स्कूलों को खेल का केंद्र बनाना और महिलाओं व दिव्यांग खिलाड़ियों को समान मंच देना होगा। खेल विज्ञान, पोषण और मानसिक प्रशिक्षण को भी महत्व देना जरूरी है। खेल केवल पदक नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, अनुशासन, आत्मविश्वास और मजबूत नागरिक बनाने का माध्यम हैं।
