दक्षिणी इटली की एक पुरानी गुफा में 130,000 साल पुरानी इंसानी खोपड़ी मिली है, जो आइस एज के दौरान यूरोप में निएंडरथल के जीवन के बारे में हमारी समझ बदल सकती है। दशकों तक वैज्ञानिकों का मानना था कि निएंडरथल की बड़ी, चौड़ी नाक ठंडी और सूखी हवा में सांस लेने के लिए विकसित हुई थी, जो ठंड के लिए उनके शरीर का खास रिस्पॉन्स थी।
यह खोपड़ी लामालुंगा गुफा में कैल्साइट की मोटी परत में सुरक्षित पाई गई, जिसने इसे अब तक के सबसे अच्छे तरीके से संरक्षित रखा। खोपड़ी को गुफा से निकाले बिना ही नाक के अंदर की संरचना की जांच करने के लिए वैज्ञानिकों ने फाइबर-ऑप्टिक इमेजिंग और 3D डिजिटल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया। इससे पता चला कि निएंडरथल की नाक में ठंडी हवा के हिसाब से ढलने वाले फीचर्स पहले से मौजूद नहीं थे।
जब गुफा में 1993 में अल्टामुरा मैन का कंकाल खोजा गया, वह लगभग पूरा था, जो पैलियोएंथ्रोपोलॉजी में बहुत कम देखने को मिलता है। इसे पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए खोपड़ी को लंबे समय तक कैल्साइट में बंद रखा गया। यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेरुगिया के कॉस्टैंटिनो बुज़ी की देखरेख में वैज्ञानिकों ने एंडोस्कोपिक प्रोब का इस्तेमाल करके खोपड़ी की नाक की अंदरूनी हड्डियों का 3D मॉडल बनाया। इसमें एथमॉइड, वोमर और इन्फीरियर नेज़ल कॉन्के जैसे संरचनाएं देखी गईं, जो दूसरे निएंडरथल खोपड़ियों में अक्सर गायब या टूटे हुए पाए जाते हैं।
इस खोज से यह पता चला कि लंबे समय से मान्यता प्राप्त विचार कि निएंडरथल की नाक ठंडी हवा को गर्म और नम करने के लिए विकसित हुई थी, पूरी तरह सही नहीं है। नए सबूत बताते हैं कि निएंडरथल के चेहरे और नाक के फीचर्स शायद केवल मौसम के हिसाब से नहीं, बल्कि कई अलग-अलग ज़रूरतों के हिसाब से बने थे। चौड़ी नाक का कारण अब वैज्ञानिक शरीर के आकार और बढ़ी हुई ऑक्सीजन की जरूरत से जोड़कर देखते हैं। बड़े और मस्कुलर शरीर वाले निएंडरथल को ज्यादा ऑक्सीजन की आवश्यकता होती थी, और चौड़ी नाक इसके लिए एक आसान और प्राकृतिक तरीका हो सकती थी।
